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Wednesday, May 4, 2016

भैरवी पूजन विधि

भैरवी पूजन विधि

मंत्र – हंहक  लं  ह सौ हं रं वं लं रं ढ ह स ख  फ्रे ऋ  हं फट
ध्यान रूप – भैरवी में ज्योतिमर्य चांदनी सी उज्जवल तीन नेत्रों वाली(तीसरे नेत्र के भैरवी के आज्ञा चक्र पर कल्पित करना चाहिए), उन्नत पयोधरों से युक्त, यौवन से भरपूर, भरे अंगों वाली यह देवी पदमासन में बैठी हुई है(भैरवी सुखासन भी मान्य है)।
इनकी चार भुजाएं है। दायें हाथ में माला(रुद्राक्ष) और वरद मुद्रा हैं(वरदान देने की मुद्रा) बायें हाथ में पुस्तक एवं अभय मुद्रा है।
विधिवत चरणों से मस्तक तक चमेली या ओड़हुल के फूलों से मंत्र पढ़ते हुए प्रोक्षण करें। हर बार फूल को मदिरा से सिक्त करें।
(यहाँ सामान्य पूजा के नियम होते है; पर उद्देश्य भैरवी में देवी भाव का (दोनों में) स्थापन होता है।)

 

घट पूजन

घट पूजन

घट पूजन     इसके पश्चात वहाँ भैरवी के सामने रखे घट का भी पूजन किया जाता है। इसमें मदिरा या मदिरा द्रव्य होता है। इसके सामने भुना मांस, भुना चना और फल होता है। तीन चषक (पात्र होते है) एक गुरु का, दूसरा साधक तीसरा साधिका का। पूजन के पश्चात सबसे पहले गुरु को मदिरा का पात्र अर्पित किया जाता है। गुरु उसे भैरवी रुपी देवी को अर्पण करता है। भैरवी उससे एक घूँट पान करती है, फिर उससे गुरु एक घूँट पान करता है, फिर साधक गुरु इसे साधक के पात्र एवं घट में डाल देता है।     साधक इसे फिर देवी को अर्पित करता है। वह एक घूँट लेती है और साधक को देती है। साधक उसे पी जाता है। यह पात्र साधक का होता है। फिर तीसरा पात्रा भरकर देवी को अर्पित किया जाता है। भैरवी घूँट भर्ती है, फिर गुरु को देती है। इस पात्र के शेष को साधक को नहीं दिया जाता । इससे देवी का पात्र जूठा हो जाता है और साधक को मना होता है। वह देवी रुपी भैरवी का जूठा खा-पी सकता है, पर उसे अपना जूठा उसे नहीं खिला सकता।     देवी पर चढ़ा प्रसाद तीनों ग्रहण करते है। पूजन की विधि सामान्य पूजन विधि होता है, जैसे देवी या घट की पूजा होती है; पर तन्त्र में मानसिक पूजा और केन्द्रीयकरण का भाव प्रमुख होता है, विधियां नहीं। साधक शुद्ध मानसिक भाव से केवल फूल प्रोक्षित करके मंत्र पाठ करके पूजन कर सकता है। घट को भी देवी माना जाता है। इसलिए इसका भी मन्त्र वहीँ होता है । यहाँ का मंत्र एक विशेष मार्ग का है। त्रिपुर  भैरवी के अन्य मन्त्र भी है।     विशेष – पूजन विधियों में अंतर भी होता है। कहीं पहले चक्र की पूजा करके भैरवी की पूजा की जाती है, तो कभी चक्र एवं घट दोनों की पूजा के बाद भैरवी पूजन होता है; पर यह सरल विधि यहाँ दी है। देवी भैरवी में प्रतिष्ठित होती है। चक्र को पीठ और घट को देवी पात्र समझ कर पूजा की जाती है।


घट पूजन


इसके पश्चात वहाँ भैरवी के सामने रखे घट का भी पूजन किया जाता है। इसमें मदिरा या मदिरा द्रव्य होता है। इसके सामने भुना मांस, भुना चना और फल होता है। तीन चषक (पात्र होते है) एक गुरु का, दूसरा साधक तीसरा साधिका का। पूजन के पश्चात सबसे पहले गुरु को मदिरा का पात्र अर्पित किया जाता है। गुरु उसे भैरवी रुपी देवी को अर्पण करता है। भैरवी उससे एक घूँट पान करती है, फिर उससे गुरु एक घूँट पान करता है, फिर साधक गुरु इसे साधक के पात्र एवं घट में डाल देता है।

साधक इसे फिर देवी को अर्पित करता है। वह एक घूँट लेती है और साधक को देती है। साधक उसे पी जाता है। यह पात्र साधक का होता है। फिर तीसरा पात्रा भरकर देवी को अर्पित किया जाता है। भैरवी घूँट भर्ती है, फिर गुरु को देती है। इस पात्र के शेष को साधक को नहीं दिया जाता । इससे देवी का पात्र जूठा हो जाता है और साधक को मना होता है। वह देवी रुपी भैरवी का जूठा खा-पी सकता है, पर उसे अपना जूठा उसे नहीं खिला सकता।

देवी पर चढ़ा प्रसाद तीनों ग्रहण करते है। पूजन की विधि सामान्य पूजन विधि होता है, जैसे देवी या घट की पूजा होती है; पर तन्त्र में मानसिक पूजा और केन्द्रीयकरण का भाव प्रमुख होता है, विधियां नहीं। साधक शुद्ध मानसिक भाव से केवल फूल प्रोक्षित करके मंत्र पाठ करके पूजन कर सकता है। घट को भी देवी माना जाता है। इसलिए इसका भी मन्त्र वहीँ होता है । यहाँ का मंत्र एक विशेष मार्ग का है। त्रिपुर  भैरवी के अन्य मन्त्र भी है।

विशेष – पूजन विधियों में अंतर भी होता है। कहीं पहले चक्र की पूजा करके भैरवी की पूजा की जाती है, तो कभी चक्र एवं घट दोनों की पूजा के बाद भैरवी पूजन होता है; पर यह सरल विधि यहाँ दी है। देवी भैरवी में प्रतिष्ठित होती है। चक्र को पीठ और घट को देवी पात्र समझ कर पूजा की जाती है।

 

भैरवी साधना की तांत्रिक सिद्धि

भैरवी साधना की तांत्रिक सिद्धि

 भैरवी साधना की तांत्रिक सिद्धि  केवल इसी स्तर पर रात्रि 9 बजे से डेढ़ बजे तक पूजित भैरवी को चक्र के मध्य बैठाकर सामान्य प्रार्थना करके मदिरा-मांस-सिन्दूर-फूल-अक्षत-बेलपत्र आदि चढ़ाकर पहले उसे फिर स्वयं उसे ग्रहण करके उसे देवी रूप ध्यान करके देखते हुए प्रतिदिन इस मंत्र का 11 माला का जाप करें।  (यहाँ एक बात जानना चाहिए। इस पूजा के बाद कई गुरु साधक की भी भैरवी द्वारा भैरव मानकर पूजा करवाते है।  दूसरी बात की वाम मार्ग के अनेक सम्प्रदाय में देवी-पूजा खा-पी कर करने के निर्देश है।)  भैरवी के सामने आसन पर बैठकर दोनों घुटनों को नग्न मिलाकर सुखासन में बैठकर, अपने-अपने घुटनों पर हाथ रखे दोनों नेत्र मिलाकर रखें। साधक पहले वाचिक, फिर मानसिक जप करें; तो 21 रात में भैरवी की  आँखों में देवी नजर आने लगती है और 108 रातों में भैरवी शक्ति साधक में समा जाती है। वह भैरवी भी देवी रूप होकर कई परा मानसिक शक्तियों की  स्वामी बन जाती है।  विशेष – यह परीक्षित प्रयोग है; पर शक्तियां कामना के अनुसार प्राप्त होती है। कामना ‘ज्ञान’ की है, तो वही शक्ति प्राप्त होगी, धन के लिए फिर सिद्धि करनी होगी, भले ही वह एक चौथाई समय में हो।


भैरवी साधना की तांत्रिक सिद्धि

केवल इसी स्तर पर रात्रि 9 बजे से डेढ़ बजे तक पूजित भैरवी को चक्र के मध्य बैठाकर सामान्य प्रार्थना करके मदिरा-मांस-सिन्दूर-फूल-अक्षत-बेलपत्र आदि चढ़ाकर पहले उसे फिर स्वयं उसे ग्रहण करके उसे देवी रूप ध्यान करके देखते हुए प्रतिदिन इस मंत्र का 11 माला का जाप करें।
(यहाँ एक बात जानना चाहिए। इस पूजा के बाद कई गुरु साधक की भी भैरवी द्वारा भैरव मानकर पूजा करवाते है।
दूसरी बात की वाम मार्ग के अनेक सम्प्रदाय में देवी-पूजा खा-पी कर करने के निर्देश है।)
भैरवी के सामने आसन पर बैठकर दोनों घुटनों को नग्न मिलाकर सुखासन में बैठकर, अपने-अपने घुटनों पर हाथ रखे दोनों नेत्र मिलाकर रखें। साधक पहले वाचिक, फिर मानसिक जप करें; तो 21 रात में भैरवी की  आँखों में देवी नजर आने लगती है और 108 रातों में भैरवी शक्ति साधक में समा जाती है। वह भैरवी भी देवी रूप होकर कई परा मानसिक शक्तियों की  स्वामी बन जाती है।
विशेष – यह परीक्षित प्रयोग है; पर शक्तियां कामना के अनुसार प्राप्त होती है। कामना ‘ज्ञान’ की है, तो वही शक्ति प्राप्त होगी, धन के लिए फिर सिद्धि करनी होगी, भले ही वह एक चौथाई समय में हो।

 

स्थान का रहस्य

स्थान का रहस्य

स्थान का रहस्य  यह ब्रह्माण्ड विशालकाय है। इसका विस्तार भी हो रहा है । स्पष्ट है कि जिसमें यह अपना विस्तार करता जा रहा है, वह ‘स्थान’ है। यदि ‘स्थान’ न हो, तो यह अपना विस्तार नहीं कर सकता। फिर यह भी प्रश्न उठता है कि जहाँ स्थान है; वहाँ कुछ न कुछ तो होगा; क्योंकि बिना किसी ‘तत्व’ के स्थान बना नहीं रह सकता। जब कुछ नहीं, तो स्थान भी नहीं होगा। इसलिए पूरी तरह स्पष्ट है कि इस स्थान में कुछ न कुछ है। इसके साथ यह भी प्रश्न उठता है कि इस स्थान का विस्तार कहाँ तक है?     बहुत सारे प्राचीन आचार्यों ने इसके सम्बन्ध में कहा है। विशेषकर उपनिषद और अनेक प्राचीन ग्रंथों में टुकड़ों में यत्र-तत्र जो कहा गया है; उससे ज्ञात होता है कि इस ‘स्थान’ का कोई प्रारंभ या अंत नहीं है। यह सर्वव्याप है। इसमें एक ऐसा नॉन फिजिकल (जो भौतिक नहीं है) तत्व फैला हुआ है, जो परम सूक्ष्म, परमविरल, परम ऊर्जा मय और सर्व चैतन्य है। इतने सारे गुण रहते हुए भी यह तत्व निर्गुण है; क्योंकि दूसरा कोई नहीं है, जिसके साथ प्रतिक्रिया करके यह अपने गुणों को प्रकट करे। इसे उपनिषदों में निर्गुण निराकार तत्व के रूप में यत्र – तत्र वर्णित किया गया है। तन्त्र ग्रंथों में इसे सदाशिव कहा गया है। अनेक अन्य विवरणों में यह भी कहा गया है कि यह तत्व अजन्मा और अविनाशी है अर्थात् यह न तो उत्पन्न होता है, न ही नष्ट होता है। यह एक ही है, इसमें कोई भेद-विभेद नहीं है।     इन विवरणों के अनुसार यह परमतत्व ही इस सृष्टि का सार तत्व है। इसमें जब तक सृष्टि की क्रिया नहीं होती, तब तक कोई गुण , आकार, क्रियात्मकता नहीं होती। जिस ब्रह्माण्ड को हम अनुभूत करते है ; वही प्रकृति है या सृष्टि है। यह प्रकृति एक सूक्ष्मतम परमाणु के रूप में प्रकट होती है और अपना विस्तार करती हुई विशालकाय ब्रह्माण्ड के रूप में अनंत रूप-गुण और क्रियाओं को व्यक्त करने लगती है। यह प्रक्रिया किसी प्रकार की उत्पत्ति नहीं है। नया कोई तत्व उत्पन्न नहीं होता। यह परम तत्व की धाराएं से बननेवाली एक जटिल संरचना है। इसमें उसके सिवा और कुछ भी नहीं है। यह ऐसा ही हैं, जैसा वायु में चक्रवात, जल में भंवर बनता है। अंतर केवल इतना है कि अपने विलक्षण (जो भौतिक नहीं) अस्तित्त्व के कारण यह अपनी धाराओं से एक जटिल संरचना बनाकर उसी में अपने गुणों को प्रकट कर रही है।     सामान्यतया देवी-देवताओं के बाद के वैज्ञानिक विवरणों में विचरण कर रहे लोगों को शायद यह समझ में न आयें; क्योंकि बहुत से लोग प्रकृति को जड़ और चेतना को परमात्मा प्रदत्त मानकर बहस करने लगते है। ऐसे लोग अपनी आस्थाओं में जीने के लिए स्वतंत्र है; जैसा कि आधुनिक विज्ञापन, जो कभी कहता है कि एक गोला फट गया, तो कभी किसी इकाई में धूल कणों के संघनित होने की कहानी कहने लगता है; पर यह प्रश्न तो बना ही रहेगा कि यह जड़ प्रकृति; जो अनंत रूपों में ढल रही है, लगातार क्रियाशील है, जिसका एक रूप भी शाश्वत नहीं है, उसके बीच वह मूल सार कौन है, जो ढल रहा है?     वह चेतन है या जड़ है ; यह तोबाद का प्रश्न है। पहला प्रश्न तो यही है कि वह गोला किस पक्षी का अंडा था? क्या वह शाश्वत था? यदि हां, तो उसमें क्रिया कैसे उत्पन्न हो गयी? धूल कण कहाँ से आ गये ?     इन प्रश्नों में उलझ कर मैंने बहुत समय तक मानसिक परिश्रम किया था, पर सिवा रहस्यों के विचित्र मायाजाल में फंसने के कोई तर्क पूर्ण आधार नहीं मिला। जहाँ तक धार्मिक आस्थाओं के देवी-देवताओं का प्रश्न है; वे सत्य है, वैज्ञानिक है; पर वे परमतत्व की धाराओं से बनने वाले इस विशेष ऊर्जा संरचना की ही शक्तियां है। इनका कोई मानवीय और स्थूल रूप नहीं है। जब हम इनकी व्याख्याओं तक पहुचेंगे और भी आश्चर्यचकित कर देने वाले सत्यों का ज्ञान होगा। हम नहीं जानते कि उस युग में जब ऊर्जा तरंगों के आधुनिक स्वरुप का ज्ञान नहीं था; इन सूक्ष्मतम तरंगों एवं संरचनाओं का ज्ञान उन लोगों को कैसे हुआ, जिनको हमारे विद्वान और प्रभावशाली लोग सपेरे, अग्निपूजक, चरवा है और टिकी रखने वाले , नंगे पांव घूमने वाले को पीनधारी गंवार से अधिक कुछ नहीं समझते। निसंदेह मैंने अपने प्रयत्नों से इस सम्पूर्ण विज्ञान को जाना है और सिएमिन आधुनिक विज्ञान की जानकारियों का एक बड़ा हाथ रहा है ; पर हमने इस विज्ञान के विवरण प्राचीनतम ग्रंथों में भी देखे है, भले ही वे अपने अपने ढंग से कहे गये है। जब मैंने उन विशाल विस्तार में फैले संस्कृत के अछूत समझकर लाइब्रेरीयों और विश्वविद्यालयों में धूल फाँक रहे इन ग्रंथों को पढ़ा है, मेरी हालत यह हो गयी कि समझ नहीं आया कि मैं रो पडू या अपने देशवासियों एवं संस्कृति के द्रोहियों की अज्ञानता पर ढहाका लगाऊं। एक अद्भुत विशालकाय विस्तृत और सूक्ष्मतम स्तर का ऊर्जा विज्ञानं , परमाणु विज्ञान, सृष्टि विज्ञान , नक्षत्र विज्ञान, जीव विज्ञान रहते हुए भी हम सारे विश्व में तकनीकी की भीख मांग रहे है।     ये सभी प्रमाणित है। आप भौतिक रूप में भी इसके प्रमाण एकत्रित कर सकते है । यदि किसी विज्ञान की व्याख्याओं के 90% प्रमाण अकाट्य रूप से प्रमाणित हो जाए, तो 10% जो आपके उपकरणों की अनुभूति सीमा के बाहर है; को भी सत्य मानने से कोई ऐतराज नहीं होना चहिये। महर्षि गौतम ने कहा था कि दो या दो से अधिक सत्य तथ्यों पर आधारित अनुमान भी सत्य ही होता है। विश्व को सर्व प्रथम कार्य-कारण नियम देने वाले न्याय दर्शन के इस प्रणेता का कहीं नाम ही नहीं है। ये दोनों यूरोपियन व्यक्तित्वों की देन समझे जाते है। जबकि इनके विवरण प्राचीन रूप में प्राप्त है। ऐसा नहीं है कि हमारे विद्वानों या सरकारों को इसका ज्ञान न हो; क्योंकि 1970 ई. से ही यह दर्शन शास्त्र के कोर्सों में पढ़ाया रहा है।     परमतत्व के इस अनंत विस्तार में सृष्टि के प्रपंच की उत्पत्ति (तन्त्र ग्रंथों में इसे प्रपंच ही कहा गया है, क्योंकि यह उत्पत्ति नहीं, एक विक्षेप है यानि स्वरुप का परिवर्तित अनुभूत होना) को बहुत से प्राचीन आचार्यों एवं ऋषि मुनियों ने इसे ‘महामाया’ कहा है। एक ऐसा मायाजाल जिसमें कुछ भी नया उत्पन्न नहीं होता; पर इसमें स्थित जीवों (इकाइयों) में अनुभूति की क्षमता में भिन्न-भिन्न शक्ति और फ्रीक्वेंसी रहने के कारण अनंत उत्पत्तियों और गुणों का प्रत्यक्ष होता है।     तन्त्र ग्रंथों में कहा गया है कि यह प्रपंच कोई आकस्मिक अनियंत्रित क्रियाओं के रूप में उत्पन्न नहीं होता। यह सब नियम बद्ध रूप से उत्पन्न होकर नियम बद्ध रूप में ही क्रिया और विकास के पथ पर सक्रिय है। सबसे बड़ा आश्चर्य यह है कि जिन नियमों एवं सूत्रों से , जिन क्रियाओं से, जिस संरचना में इस ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति होती है और विकास होता है; उन्ही नियमों एवं सूत्रों से इसकी प्रत्येक बड़ी या छोटी इकाइयों की उत्पत्ति, क्रिया, संरचना, विकास एवं संहार का स्वरुप होता है। यानी सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड और इसकी इकाइयों की उत्पत्ति से लेकर संहार तक , संरचना से लेकर क्रिया तक एक ही प्रकार के नियमों एवं सूत्रों से बद्ध है। इसमें कहीं कोई अपवाद नहीं है। ये नियम और सूत्र ब्रह्माण्ड के नहीं है। ये उस परमतत्व से उत्पन्न होते है। ब्रह्माण्ड और इसकी इकाईयां इससे शासित है। किसी सूक्ष्मत या विशालतम इकाई की शक्ति नहीं कि इन नियमों से बाहर चला जाए। ये नियम शाश्वत एवं अपरिवर्तनशील है। ब्रह्माण्ड हजार बार उत्पन्न हो, नियम ये ही रहेंगे।     हमारे बुद्धिवादी और विज्ञानवादी प्रमाण प्रमाण चिल्लाने लगेंगे। इनके प्रत्यक्ष प्रमाण है। परन्तु पहले यह जानना जरूरी है कि वे नियम क्या है और यह सृष्टि कैसे उत्पन्न होती है और इसका विकास किस प्रकार होता है?

स्थान का रहस्य

यह ब्रह्माण्ड विशालकाय है। इसका विस्तार भी हो रहा है । स्पष्ट है कि जिसमें यह अपना विस्तार करता जा रहा है, वह ‘स्थान’ है। यदि ‘स्थान’ न हो, तो यह अपना विस्तार नहीं कर सकता। फिर यह भी प्रश्न उठता है कि जहाँ स्थान है; वहाँ कुछ न कुछ तो होगा; क्योंकि बिना किसी ‘तत्व’ के स्थान बना नहीं रह सकता। जब कुछ नहीं, तो स्थान भी नहीं होगा। इसलिए पूरी तरह स्पष्ट है कि इस स्थान में कुछ न कुछ है। इसके साथ यह भी प्रश्न उठता है कि इस स्थान का विस्तार कहाँ तक है?

बहुत सारे प्राचीन आचार्यों ने इसके सम्बन्ध में कहा है। विशेषकर उपनिषद और अनेक प्राचीन ग्रंथों में टुकड़ों में यत्र-तत्र जो कहा गया है; उससे ज्ञात होता है कि इस ‘स्थान’ का कोई प्रारंभ या अंत नहीं है। यह सर्वव्याप है। इसमें एक ऐसा नॉन फिजिकल (जो भौतिक नहीं है) तत्व फैला हुआ है, जो परम सूक्ष्म, परमविरल, परम ऊर्जा मय और सर्व चैतन्य है। इतने सारे गुण रहते हुए भी यह तत्व निर्गुण है; क्योंकि दूसरा कोई नहीं है, जिसके साथ प्रतिक्रिया करके यह अपने गुणों को प्रकट करे। इसे उपनिषदों में निर्गुण निराकार तत्व के रूप में यत्र – तत्र वर्णित किया गया है। तन्त्र ग्रंथों में इसे सदाशिव कहा गया है। अनेक अन्य विवरणों में यह भी कहा गया है कि यह तत्व अजन्मा और अविनाशी है अर्थात् यह न तो उत्पन्न होता है, न ही नष्ट होता है। यह एक ही है, इसमें कोई भेद-विभेद नहीं है।

इन विवरणों के अनुसार यह परमतत्व ही इस सृष्टि का सार तत्व है। इसमें जब तक सृष्टि की क्रिया नहीं होती, तब तक कोई गुण , आकार, क्रियात्मकता नहीं होती। जिस ब्रह्माण्ड को हम अनुभूत करते है ; वही प्रकृति है या सृष्टि है। यह प्रकृति एक सूक्ष्मतम परमाणु के रूप में प्रकट होती है और अपना विस्तार करती हुई विशालकाय ब्रह्माण्ड के रूप में अनंत रूप-गुण और क्रियाओं को व्यक्त करने लगती है। यह प्रक्रिया किसी प्रकार की उत्पत्ति नहीं है। नया कोई तत्व उत्पन्न नहीं होता। यह परम तत्व की धाराएं से बननेवाली एक जटिल संरचना है। इसमें उसके सिवा और कुछ भी नहीं है। यह ऐसा ही हैं, जैसा वायु में चक्रवात, जल में भंवर बनता है। अंतर केवल इतना है कि अपने विलक्षण (जो भौतिक नहीं) अस्तित्त्व के कारण यह अपनी धाराओं से एक जटिल संरचना बनाकर उसी में अपने गुणों को प्रकट कर रही है।

सामान्यतया देवी-देवताओं के बाद के वैज्ञानिक विवरणों में विचरण कर रहे लोगों को शायद यह समझ में न आयें; क्योंकि बहुत से लोग प्रकृति को जड़ और चेतना को परमात्मा प्रदत्त मानकर बहस करने लगते है। ऐसे लोग अपनी आस्थाओं में जीने के लिए स्वतंत्र है; जैसा कि आधुनिक विज्ञापन, जो कभी कहता है कि एक गोला फट गया, तो कभी किसी इकाई में धूल कणों के संघनित होने की कहानी कहने लगता है; पर यह प्रश्न तो बना ही रहेगा कि यह जड़ प्रकृति; जो अनंत रूपों में ढल रही है, लगातार क्रियाशील है, जिसका एक रूप भी शाश्वत नहीं है, उसके बीच वह मूल सार कौन है, जो ढल रहा है?

वह चेतन है या जड़ है ; यह तोबाद का प्रश्न है। पहला प्रश्न तो यही है कि वह गोला किस पक्षी का अंडा था? क्या वह शाश्वत था? यदि हां, तो उसमें क्रिया कैसे उत्पन्न हो गयी? धूल कण कहाँ से आ गये ?

इन प्रश्नों में उलझ कर मैंने बहुत समय तक मानसिक परिश्रम किया था, पर सिवा रहस्यों के विचित्र मायाजाल में फंसने के कोई तर्क पूर्ण आधार नहीं मिला। जहाँ तक धार्मिक आस्थाओं के देवी-देवताओं का प्रश्न है; वे सत्य है, वैज्ञानिक है; पर वे परमतत्व की धाराओं से बनने वाले इस विशेष ऊर्जा संरचना की ही शक्तियां है। इनका कोई मानवीय और स्थूल रूप नहीं है। जब हम इनकी व्याख्याओं तक पहुचेंगे और भी आश्चर्यचकित कर देने वाले सत्यों का ज्ञान होगा। हम नहीं जानते कि उस युग में जब ऊर्जा तरंगों के आधुनिक स्वरुप का ज्ञान नहीं था; इन सूक्ष्मतम तरंगों एवं संरचनाओं का ज्ञान उन लोगों को कैसे हुआ, जिनको हमारे विद्वान और प्रभावशाली लोग सपेरे, अग्निपूजक, चरवा है और टिकी रखने वाले , नंगे पांव घूमने वाले को पीनधारी गंवार से अधिक कुछ नहीं समझते। निसंदेह मैंने अपने प्रयत्नों से इस सम्पूर्ण विज्ञान को जाना है और सिएमिन आधुनिक विज्ञान की जानकारियों का एक बड़ा हाथ रहा है ; पर हमने इस विज्ञान के विवरण प्राचीनतम ग्रंथों में भी देखे है, भले ही वे अपने अपने ढंग से कहे गये है। जब मैंने उन विशाल विस्तार में फैले संस्कृत के अछूत समझकर लाइब्रेरीयों और विश्वविद्यालयों में धूल फाँक रहे इन ग्रंथों को पढ़ा है, मेरी हालत यह हो गयी कि समझ नहीं आया कि मैं रो पडू या अपने देशवासियों एवं संस्कृति के द्रोहियों की अज्ञानता पर ढहाका लगाऊं। एक अद्भुत विशालकाय विस्तृत और सूक्ष्मतम स्तर का ऊर्जा विज्ञानं , परमाणु विज्ञान, सृष्टि विज्ञान , नक्षत्र विज्ञान, जीव विज्ञान रहते हुए भी हम सारे विश्व में तकनीकी की भीख मांग रहे है।

ये सभी प्रमाणित है। आप भौतिक रूप में भी इसके प्रमाण एकत्रित कर सकते है । यदि किसी विज्ञान की व्याख्याओं के 90% प्रमाण अकाट्य रूप से प्रमाणित हो जाए, तो 10% जो आपके उपकरणों की अनुभूति सीमा के बाहर है; को भी सत्य मानने से कोई ऐतराज नहीं होना चहिये। महर्षि गौतम ने कहा था कि दो या दो से अधिक सत्य तथ्यों पर आधारित अनुमान भी सत्य ही होता है। विश्व को सर्व प्रथम कार्य-कारण नियम देने वाले न्याय दर्शन के इस प्रणेता का कहीं नाम ही नहीं है। ये दोनों यूरोपियन व्यक्तित्वों की देन समझे जाते है। जबकि इनके विवरण प्राचीन रूप में प्राप्त है। ऐसा नहीं है कि हमारे विद्वानों या सरकारों को इसका ज्ञान न हो; क्योंकि 1970 ई. से ही यह दर्शन शास्त्र के कोर्सों में पढ़ाया रहा है।

परमतत्व के इस अनंत विस्तार में सृष्टि के प्रपंच की उत्पत्ति (तन्त्र ग्रंथों में इसे प्रपंच ही कहा गया है, क्योंकि यह उत्पत्ति नहीं, एक विक्षेप है यानि स्वरुप का परिवर्तित अनुभूत होना) को बहुत से प्राचीन आचार्यों एवं ऋषि मुनियों ने इसे ‘महामाया’ कहा है। एक ऐसा मायाजाल जिसमें कुछ भी नया उत्पन्न नहीं होता; पर इसमें स्थित जीवों (इकाइयों) में अनुभूति की क्षमता में भिन्न-भिन्न शक्ति और फ्रीक्वेंसी रहने के कारण अनंत उत्पत्तियों और गुणों का प्रत्यक्ष होता है।

तन्त्र ग्रंथों में कहा गया है कि यह प्रपंच कोई आकस्मिक अनियंत्रित क्रियाओं के रूप में उत्पन्न नहीं होता। यह सब नियम बद्ध रूप से उत्पन्न होकर नियम बद्ध रूप में ही क्रिया और विकास के पथ पर सक्रिय है। सबसे बड़ा आश्चर्य यह है कि जिन नियमों एवं सूत्रों से , जिन क्रियाओं से, जिस संरचना में इस ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति होती है और विकास होता है; उन्ही नियमों एवं सूत्रों से इसकी प्रत्येक बड़ी या छोटी इकाइयों की उत्पत्ति, क्रिया, संरचना, विकास एवं संहार का स्वरुप होता है। यानी सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड और इसकी इकाइयों की उत्पत्ति से लेकर संहार तक , संरचना से लेकर क्रिया तक एक ही प्रकार के नियमों एवं सूत्रों से बद्ध है। इसमें कहीं कोई अपवाद नहीं है। ये नियम और सूत्र ब्रह्माण्ड के नहीं है। ये उस परमतत्व से उत्पन्न होते है। ब्रह्माण्ड और इसकी इकाईयां इससे शासित है। किसी सूक्ष्मत या विशालतम इकाई की शक्ति नहीं कि इन नियमों से बाहर चला जाए। ये नियम शाश्वत एवं अपरिवर्तनशील है। ब्रह्माण्ड हजार बार उत्पन्न हो, नियम ये ही रहेंगे।

हमारे बुद्धिवादी और विज्ञानवादी प्रमाण प्रमाण चिल्लाने लगेंगे। इनके प्रत्यक्ष प्रमाण है। परन्तु पहले यह जानना जरूरी है कि वे नियम क्या है और यह सृष्टि कैसे उत्पन्न होती है और इसका विकास किस प्रकार होता है?

 

Tuesday, May 3, 2016

तन्त्र विद्या का वैज्ञानिक रहस्य

तन्त्र विद्या का वैज्ञानिक रहस्य

तन्त्र विद्या का वैज्ञानिक रहस्य 

तन्त्र विद्या का वैज्ञानिक रहस्य

 

जिस विषय को आप तक पहुँचाने के लिए धर्मालय की स्थापना की गयी थी, उसे उसे वास्तविक तौर पर बताने के लिए मैं आज से प्रयत्न कर रहा हूँ । इतने दिनों तक मैं ऐसे लोगों को जोड़ने का प्रयत्न करता रहा, जो वास्तव में जानना चाहते है । जिनके मन में जिज्ञासा है कि धर्म की जिन मान्यताओं को हम मानते है, उनके पीछे कोई सत्य भी है या ये नितांत अंधी आस्थाएं है; जैसा कि विश्व के बुद्धिजीवी कहते है । जो ये जानना चाहते है कि मन्दिर में घंटा बजाने और गुरुद्वारे में मत्थे टेकने से क्यों लाभ होता और क्यों नहीं होता है, तो क्यों नहीं होता है । सनातन धर्म का स्वरुप आज विचित्र हो गया है । लोग धर्म को पूजा-पाठ-चन्दन-तिलक-भभूत-जटाओं की तराजू में तौल रहे है । किसी को कोई विशेष सिद्धि चाहिए, कोई इस विश्वास में है कि आकाश में कोई देवी रहती है , कोई यह मानता है कि नहीं , वे देवी नहीं देवता है, कोई विष्णुपुराण का भक्त है, तो कोई शिव पुराण का । ऐसा कोई भी व्यक्ति इस विज्ञान को समझना नहीं चाहेगा । इसलिए नहीं चाहेगा कि उसके गुरु ने तो नाक की सीध में चलने के लिए कहा था, सामने पेड़ आ गया तो उसपर चढ़ जाते? बायें-दायें घूमें क्यों? शास्त्रों के अर्थ लगाने के संबध में दयानन्द सरस्वती का एक कथन याद आ जाता है कि भोजन करते समय ‘सैन्धव’ मांगने पर जो घोडा ले आये , ऐसा विद्वान् किस काम का? एक दूसरी समस्या भी सामने आ जाती है ।

जब भी कभी हम धर्म के सत्य का ज्ञान करना चाहेंगे, हमें इससे सम्बन्धित सभी चीजों का अध्ययन करना होगा । किसी के गुरु , एक श्लोक, एक शास्त्र, एक सम्प्रदाय ने नाम पर इसके सत्य को जाना नहीं जा सकता ।सत्य को जानने के लिए अच्छे – बुरे सबको छानना होगा ।आप किसी विषय को अछूत मानकर सत्य का ज्ञान नहीं कर सकते । प्रत्येक विषय , प्रत्येक क्षेत्र के कई रंग होते है । जब तक सबको न जाना जाए, उस विषय को समझना मुश्किल है ।

मैं न तो तांत्रिक था, न ही आध्यात्मिकभगवान् के मन्दिर में सिर जरूर नवाता था, देवी-देवताओं पर श्रद्धा भी थी; परन्तु यह सभी सांस्कारिक था । मैं धार्मिक नहीं था, परम्परागत नियमों के प्रति भी लापरवाह था । मेरे मन में बचपन से केवल एक ही जिज्ञासा था कि यह क्या है? क्या है यह अजूबा? जिसके के नन्हे से गोले पर हमारी दुनिया बसी हुई है । यह क्या है? क्यों है? यह जानने की स्वाभाविक इच्छा थी ।मैं आधुनिक शिक्षित था, इसलिए विज्ञान में ही इसका हल ढूँढने लगा ।यह एक पागलपन था ।मुझे खुद विश्वास नहीं था कि इसमें कोई सफलता मिलेगी ।

वह 1975-85 का समयकाल था । मैं लाखों बिकने वाली पत्रिकाओं का सम्पादक था । अधिक समय नहीं मिलता था । उस समय सूचना के माध्यम भी अत्यंत सिमित थे । गनीमत केवल यह थी कि शिक्षा के क्षेत्र में अच्छे लोग थे । उन्होंने अपने स्तर पर जानकारियों में मेरीसहायता की । इससे एक ही निष्कर्ष निकला कि वह कोई ऊर्जा है, जो पदार्थों में ढल रही है । प्रत्येक इलेक्ट्रान-प्रोटोन टूटकर उसी में परिवर्तित होता है ।

यही एक आकस्मिक रूप में मुझे गीता को पढ़ा । कार्य प्रोफेशनल था; मैं अन्धास्थावादी नहीं था । मेरा दृष्टिकोण एक निष्पक्ष पत्रकार का ही था । जितना गीता पर भाष्य लिखने वाले बता रहे थे, वह सब उसका पॉइंट तो पॉइंट अर्थ नहीं था और जो शाब्दिक अर्थ वाली पुस्तकें थी; उनमें इतने पारिभाषिक शब्दों की भरमार थी कि जब तक उनके अर्थ ज्ञात न हो, कोई समझ में आने वाला अर्थ बनता ही नहीं था । पर मुझे इतना ज्ञात हो गया था कि जो मैं जानना चाहता था, या उसी के बारे में कुछ कहा जा रहा है । क्या? यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं था ।

इसके बाद मैं आध्यात्मिक क्षेत्र की ओर मुड़ा । कुछ दिन जंगलों-पहाड़ों पर भी भटका, साधना स्थलों के रूप में प्रसिद्ध स्थलों पर गुप्त और विद्वान् साधकों की तलाश करता रहा । बाजारू तांत्रिकों से भी टकराया और प्राचीन गुप्त संस्कृत ग्रंथों की तलाश करता रहा । परन्तु सूर्य बादलों के पीछे था । जो वहां कहा गया था, उसका तात्पर्य क्या है, जानने के लिए अथक परिश्रम करना पड़ रहा था । मैं शून्य समाधि का भी अभ्यास कर रहा था और तब जो हुआ; उसको में आजतक नहीं समझ पाया । कुछ दिव्य व्यक्तित्व आये और उन्होंने मेरे मस्तिष्क में उठने वाले सारे प्रश्नों का उत्तर देना शुरू किया । जो मैंने जाना , जो कुछ मैं बताने जा रहा हूँ; वह इतना विस्मयकारी है कि हतप्रद कर देता है । और मैंने केवल जानना चाहा था; बताने वाला कोई और है । प्राप्ति के इस स्रोत पर आपको विश्वास नहीं होगा, पर जो कुछ ज्ञात हुआ है , उसे जानना मानव मात्र के लिए कल्याणकारी है ।

मैं आपको कोई फैंटम कहानी सुनाने नहीं जा रहा । मैं आपको इस प्रकृति के उस विज्ञान के बारे में बताने जा रहा हूँ, जो समय, काल, युग , से परे है । जो इस ब्रह्माण्ड का विज्ञान है । इसकी उत्पत्ति सेलेकर क्रियात्मकता से संहार तक की स्थिति को बताने वाला यह विज्ञान कहाँ से आया, किसने सबसे पहले इसे बताया या यह एक क्रमिक विकास का प्रतिफल है; मैं कह नहीं सकता; पर प्राचीन काल में भी हमारे विद्वान पूर्वज किसी न किसी रूप में इसे व्यक्त करते रहे है । हमारा कर्तव्य बनता है कि हम इस विज्ञान के वैज्ञानिक स्वरुप को जाने और जानकर इससे लाभ उठाये । क्योंकि हमारे भौतिक जीवन से लेकर धार्मिक कृत्यों और दैनिक क्रियाओं से लेकर आधुनिक वैज्ञानिक आविष्कारों के पीछे इसी विगयान के नियम और सूत्र कम कर रहे है । जो इसके अनुरूप नहीं है, वह इस प्रकृति में होता ही नहीं है । वह संहार की क्रिया है यानी उस क्रिया या स्वरुप का नाश ।

हो सकता है कि यह आपको बडबोलापन लगता हो; पर सत्य यही है । इसीलिए भारत को जगतगुरु कहा जाता रहा है । हम आज तकनीकी के लिए भटक रही है; तो यह हमारी अज्ञानता है । हमारे पूर्वजों ने तो हर एक बात सूक्ष्मतम विस्तार से बताई है ।यह टुकड़ों में है, अधूरे है; एकांगी भी है, इसमें सम्प्रदायवाद भी है; पर यह सब एक ही विज्ञान पर आधारित है । उस विज्ञान का, जो यह बताता है कि एक ग्लास पानी पीने के लिए आपको अंदर ऊर्जा स्तर पर कैसे क्रियाएं सम्पन्न होती है ।

जैसा कि आज के बौद्धिकवाद को आदत है, वह प्रमाण की बात करेगा; पर प्रमाण तो प्रमाण ढूँढने की इच्छा के बाद ही प्राप्त होता है । मस्तिष्क की प्राप्त जानकारियाँ को सत्य मानकर लिया गया निष्कर्ष जानने के सारे मार्ग पहले ही बंद कर देता है । इस विज्ञान के सभी प्रमाण प्रत्यक्ष है । केवल इसे न जानने के कारण उस दृष्टिकोण से परिक्षण न होने से वे सार्वजनिक रूप से प्रकट नहीं है ।

इस विज्ञान में तन्त्र-विद्या का स्थान
‘तन्त्र’ के नाम पर आज अनेक प्रकार की मिथ्या धारणाएं फैली हुई है । सामान्यता लोग अभिचार कर्मों को तन्त्र समझ रहे है और इसके नाम पर यह भयभीत हो जाते है या नाक भौं सिकोड़ने लगते है । पर यह भारी भ्रम है । ‘तन्त्र’ के प्राचीनतम आचार्यों के ग्रंथों को पढ़े बिना यह ज्ञात नहीं हो सकता कि यह क्या है? ‘तन्त्र’ का वास्तविक अर्थ “सिस्टम” है । यह एक सिस्टम का शास्त्र है ।

प्रश्न उठता है कि कौन सा सिस्टम?
इसका उत्तर इस प्रकार है —
वह सिस्टम , जो एक नॉन फिजिकल वीरल सूक्ष्म तेजोमय तत्व में उत्पन्न होता है; जो शाश्वत है, सर्वत्र फैला हुआ है , यह न तो उत्पन्न होता है , न इसका नाश होता है । स्थान का अस्तित्व इसके कारण है और स्थान का विस्तार असीमित है । इस अनंत विस्तार वाले इस नॉन फिजिकल एलिमेंट से ही इस ब्रह्माण्ड के पॉवर सिस्टम की उत्पत्ति होती है । यह एक ऊर्जा संरचना के क्रम से उत्पन्न होकर विकसित होने का सिस्टम है । यह सारे ब्रह्माण्ड के रहस्यों को प्रारंभ से लेकर अंत तक बताता है ।

वस्तुतः भारतीय आध्यात्म का दो रूप है । एक गृहस्थों एवं समाज के लिए सामान्य क्रिया कर्म, पूजा-पाठ , उपदेश, सत्संग के रूप में । दूसरा वैज्ञानिक रूप में, जिसे तंत्र कहा जाता है । वैदिक और शैवमार्ग के भेद से यह ‘ब्रह विद्या’ और ‘तन्त्र विद्या’ है । यह हमें बताता है कि इस ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति किसमें , क्यों, और किस प्रकार होती है । इसके अस्तित्व से लेकर क्रिया और संहार तक की व्यवस्था किस प्रकार एक के बाद एक उत्पन्न होती है । इससे ही यह ब्रह्माण्ड अनंत रूपों, अनंत स्तरों, अनंत गुणों, में व्यक्त हो रहा है । यह क्या है, क्यों है , कैसे है और किस प्रकार विकसित होता है; हम इसमें क्या है और क्यों है – यह यह भी बताता है ।

सार्वाधिक महत्वपूर्ण यह विज्ञान ही है । चमत्कारिक सिद्धि साधनाएं नहीं । मानवता का कल्याण इस विज्ञानं को जानने से हो सकता है , विधि-विधान और वर्जनाओं से भरी प्रायोगिक क्रियाओं द्वारा नहीं । हजारों वर्ष पहले की दुनिया में भटकना उचित नहीं है । आज की दुनिया ऊर्जा-जगत से जुड़ गयी है । इस विज्ञान का उपयोग आधुनिक रूप में किया जा सकता है । पर सब कुछ संध आस्था के गर्भ में डूबा है । एक का मानना है कि यह सब अंधी आस्था है, एक का मानना है , नहीं जी सब कुछ शिव जी ने किया है, यह विष्णु जी तो पुराणों से थोपे गये है ।

यदि इस सम्प्रदाय वादी सोच से हटकर हम दोनों से सम्बन्धित शास्त्रों , कथनों आदि को पढ़कर या जानकर समझने का प्रयत्न करें; तो हमें ज्ञात हो जाएगा कि सब एक ही विज्ञान को कहने का प्रयत्न कर रहे अहि; केवल कहने और प्राप्त करने की विधियों –मान्यताओं में अन्तर है ।

शास्त्र की सभी बातें प्रमाण ही हो यह आवश्यक नहीं है । ये सारे लुप्त प्राय थे । इन्हें ढूंढा और सम्पादित किया गया है । बहुत से अंश प्राप्त ही नहीं है । इन कथनों को परखने की कसौटी भी यही विज्ञान है । जो इसके विपरीत है, वह कृत्रिम है और भौतिक कारणों से बनाया गया है या जोड़ा गया है । भारत में कभी स्त्रियों को आध्यात्मिक क्षेत्र से वर्जित अन्हीं किया गया; पर ऐसे भी श्लोक सामने आ जाते है । इनके सत्यासत्य को सम्पूर्ण आचारण से समझिये । क्या यह व्यवहार या मानसिकता कहीं थी? तुरंत ज्ञात होगा कि यह पैबंद है । मूलचादर इसी रंग का नहीं अहि ।

ब्रह्माण्ड के गुप्त वैज्ञानिक रहस्य
इससे पहले कि मैं इस अचम्भित कर दने वाले विषय पर प्रकाश डालने का प्रयत्न करूँ; इसके सम्बन्ध में थोडा सामान्य रूप से जानना समीचीन होगा ।यह विषय इस प्रकार है –

उस विषय का सार कुछ प्रश्नों का उत्तर तलाशना है । ये प्रश्न वे ही हैं, जो मेरे मन में बचपन से उत्पन्न हुए थे । यह विस्तृत अजूबा यह ब्रह्माण्ड क्या है? इसके एक छोटे से कण पर हमारी दुनिया बसी हुई है और समस्त दुनिया के झमेले इसमें ही व्याप्त है । आखिर हम क्या है , कौन है , कहाँ से आते हैं? कहाँ चले जाते है ।

ये सभी आधुनिक वैज्ञानिकों के लिए भी जिज्ञासा का विषय है । उनकी खोज निरंतर चल रही है और उन्होंने बहुँत सारी बातें खोजी भी हैं । यह दूसरी बात है कि उन प्राप्त तथ्यों के आधार पर निकाले गये उनके निष्कर्षों में अनुमान अधिक है ।

आपको आश्चर्य होगा भारत में जाने किस युग से इन प्रश्नों के उत्तर तलाशे जा रहे अहि और यहाँ के ऋषियों आचार्यों ने इस पर बहुत कुछ कहा भी है । यद्यपि समयकाल के कारणों से ये टुकड़ो में है, अधूरे है और इनमें प्रायोगिक क्षेत्र ही अधिक रह गये है । संभवतः इस कारण कि इनका उपयोग सामान्य जीवन और मानव मन की लालसाओं में अधिक था । विज्ञानं के क्षेत्र अधूरे, खंडित, और सम्प्रदाय भेद से भिन्न-भिन्न रूप में कहे गये है । इनको समझने में कठिनाई होती है और न समझने पर लोग अंधी आस्थाओं के शिकार हो जाते है ।

क्या है यह विज्ञान

जब भी हम इस ब्रह्माण्ड को जहाँ तक प्रत्यक्ष करते है या इसके बारे में जो कुछ जानते है; उसपर विचार करें ; तो यह प्रश्न सामने आता है कि यह किसमें व्याप्त है? विज्ञान का आधुनिक रूप कहता है कि यह फ़ैल रहा है ; पर किसमें?

इसका स्वाभाविक उत्तर आता है कि ‘स्थान’ में । और यहीं यह प्रश्न उठता है कि यह स्थान क्या है?यदि स्थान का अस्तित्त्व है, तो उसमें जरूर कुछ न कुछ होगा, क्योंकि जहाँ कुछ नहीं ; वहां ‘स्थान’ का भी अस्तित्त्व नहीं रह सकता । यहीं से इस विज्ञान की शुरुआत होती है ।

 

यंत्रों का महाविज्ञान, श्री यंत्र का आश्चर्यजनक रहस्य

यंत्रों का महाविज्ञान, श्री यंत्र का आश्चर्यजनक रहस्य

 

यंत्रों का महाविज्ञान, श्री यंत्र का आश्चर्यजनक रहस्य 

 

यंत्रों का महाविज्ञान, श्री यंत्र का आश्चर्यजनक रहस्य

तांत्रिक एवं आध्यात्मिक यंत्रों को हमारा बौद्धिक समाज तो नहीं ही समझ रहा है ; आध्यात्मिक स्तर पर भी इन्हें समझने का प्रयत्न कोई नहीं करता। बस पूजा घर में स्थापित कर दो और धूप-दीप दिखाकर पूजा करो; सब सही हो जाएगा। मंत्र जप करो, सिद्धि मिल जाएगी। मगर जब हमे इसे आधुनिक वैज्ञानिक और स्पष्ट रूप में समझने की कोशिश करेंगे; तभी इनका कोई फल प्राप्त होगा। केवल आस्था से भावना फलित होती है; पर जब हम जानकर उसका प्रयोग करते है, तो भावना , मन, बुद्धि, मस्तिष्क सभी एक होते है और तब वह भावना स्थिर मजबूत, अविश्वास संदेह से रहित होती है। सबसे पहले हम श्री यंत्र को समझेंगे।

श्री यंत्र कई प्रकार के होते है। बिना कर्णिका का षट्कोण; जो वास्तव में उर्ध्वनामान्याय नामक मार्ग का भैरवी चक्र है।शास्त्रीय स्तर पर यह कहा गया है कि शिव के पांच मुखों से तन्त्र को पांच मार्ग प्रकट हुए। चारों दिशाओं के नाम पर और एक उर्ध्वमुखी। उर्ध्व नाम्नाय इसी प्रकार का मार्ग है। इसका आंतरिक स्वरुप बेहद गुप्त है और इसके बारे में आंतरिक रहस्यों को जानने के लिए किसी गुरु का मिल जाना होता है; जो कभी अपना परिचय किसी को नहीं बताता। वह वेशभूषा , आडम्बर रहित चादर विहीन यानी बिना कोई धार्मिक आचरण ओढ़े काम करने वाला होता है। वह राजा भी हो सकता है, वैश्य , क्षत्रिय या शुद्र भी। इसमें जितना श्रेष्ठ ज्ञानी गुरु होता है; उसी की महत्ता होती है। जाती आदि या स्त्री-पुरुष आदि पर कोई भेद नहीं होता। ब्राहमण को शुद्र का पैर धोना पड़ सकता है, पुरुष को स्त्री का। जो इस मार्ग के रहस्यों को जानकार है, वही शिव है , वही भैरव है। इनका कोई बाहरी रूप नहीं होता, इसलिए इन्हें पहचानना कठिन है।

श्री यंत्र एक अन्य रूप कर्णिका और कमल दल सहित होता अहि। इसमें नव कोण होता है और आठ दल के बाद भरपूर होता है। इसमें नवधा शक्ति की पूजा होती है। एक रूप केवल एक त्रिकोण का है; इसमें प्रारंभ के टिन आदि शक्ति की पूजा होती है। इसमें काली-तारा आदि है। इसे हम पहले स्पष्ट कर चुके है (तन्त्र – रहस्य देखें) एक की कर्णिका में षट्कोण होता है। एक में 14 कोण होते है। इसमें दो कर्णिका होती है। पहले की वृत्त रेखा पर आठ दल और दूसरे की वृत्त रेखा पर 16 दल होते है। फिर तीन रेखाओं का वृत्त और चारों ओर तीन रेखाओं वाला भरपूर होता है।

हमने सबसे पहले श्री यंत्र को इसलिए चुना है कि इस यंत्र को समझे बिना भारतीय आध्यात्म को समझना संभव नहीं है। अधिकतर देवी-देवता की पूजा इसी पर की जाती है। यह वाममार्ग का यंत्र है; पर इसी पर वाम-दक्षिण मार्ग के पूजा के सारे चक्रों , योग विद्या के सभी चक्रों, काली दुर्गा आदि देवियों की पूजा में वर्णित चक्रों का विज्ञान आधारित है। समस्त देवी पिंडियाँ , समस्त मातृकाएं , सभी शिवलिंग , मन्दिर आदि में इसी का विज्ञान है। सच तो यह है कि इसी श्री चक्र का एक रूप चाहे स्त्री हों या पूरुष हम भी है। यह जीव –जन्तु ,नर-मादा , पेड़-पौधों, धरती-सूरज, यह ब्रह्माण्ड और इसकी छोटी बड़ी सभी इकाई में व्याप्त है।ब्रह्माण्ड में जो भी, जहाँ भी, जिस रूप में भी है; उस पर इसी यंत्र का विज्ञान क्रियाशील है। यह परा विज्ञान के उस आश्चर्यचकित कर देने वाले पॉवर-साइंस का वर्णन है, जिसके बारे में आधुनिक विज्ञान, ए.बी.सी.डी. नहीं जानता।

इन श्री यंत्रों में एक, दो, तीन, पांच एवं नौ त्रिकोणों की रचना की जाती है। शास्त्रीय रूप में प्रथम उर्ध्वगामी त्रिकोण, आधाशक्ति है। इसे देवी की योनि प्रदेश, कमर, नाभि से निचे पैरों के हिस्सों के रूप में जाना जाता है, अधोगामी त्रिभुज में चेहरा बांह , स्तन माना जाता अहि। शास्त्रों में बाहों-पैरों का नाम नहीं है; क्योंकि ये कर्णिका की वृत्तात्मक रेखाएं है।

तन्त्र में अनेक मार्ग है। अनेक केवल शास्त्रों में है, वे इतने गुप्त है की उनके बारे में शास्त्रों में भी कम विवरण मिलते है। मुख्य रूप से जो ज्ञात है, उसमें कादिमत, हादिमत और कहादि मत है । यह नाम मन्त्रों के आधार पर है। कादिमत के मन्त्रों में मंत्र ‘क’ से प्रारंभ होते है, हादिमत में ‘ह’ से । कहादि मत में यह ‘कह’ से प्रारम्भ होते है। इन मतों की गुरु परम्परा में गुरुओं की श्रृंखलाएं है। इसमें दैवौद्य , सिद्धौद्य एवं मानवौद्यवर्ग है। एक-एक वर्ग में कई-कई गुरु है।

क्या है श्री यंत्र                                 
तन्त्र रहस्य में हम बता आये है कि यह सृष्टि की उत्पत्ति, आत्मा की उत्पत्ति , अंकों की उत्पत्ति, इस ब्रह्माण्ड और इसकी इकाईयों के पॉवर-स्ट्रक्चर का आउटर स्केच है।इस स्केच में केवल मुख्य बाते है । इसकी वास्तविक संरचना इतनी जटिल है कि स्केच बनानेवाला कोई बड़ा एक्सपर्ट कंप्यूटर पर बैठे; तो कम से कम एक महीना लगेगा। वह भी कर सका, तो। इसकी थ्री डी संरचना (त्रिकोणों , कर्णिका और भूपुर की) किस प्रकार ही होती है, उसका सम्पूर्ण विवरण तन्त्र रहस्य शीर्षक में है। पर वह भी आउटर स्केच । परन्तु फिर भी इसके बहुत सारे रहस्यों को वहां वैज्ञानिक शब्दों में समझा दिया है।

हमारा शेषनाग, हमारा कछुआ, हमारे पुराणों का मत्यावतार आदि अनेक रूपक कथाओं का वैज्ञानिक सूत्र यहाँ है। इस श्री चक्र के चित्र में सृष्टि का समस्त रहस्य छिपा हुआ है।

इस चक्र पर सभी प्रकार कि पूजा तीन प्रकार से होती है –
  1. स्थूल
  2. सूक्ष्म
  3. भाव प्रधान
स्थूल पूजा – यह भौतिक रूप की पूजा होती है। भावरूप का चित्र या मूर्ती बनाकर या भैरवी को अभिषेक करके मंत्र और विधि के साथ दीक्षित करके देवी बनाकर। इसमें यंत्र के मध्य देवी के या देवता के स्थूल रूप को स्थापित किया जाता है।

सूक्ष्म पूजा – इसमें यंत्र पूजन करके मंत्र जपा जाता है। यंत्र के अंदर ही देवी-देवता की भावना की जाती है।

भाव प्रधान – इसमें सब कुछ भाव में होता है। इसमें बहुत से भैरवी का होना आवश्यक मानते है, बहुँत केवल ध्यान में ही सारी साधना करते है।

ये सारी साधनाएं ज्ञान और मुक्ति के लीये की जाती है। सिद्धि इनका उद्देश्य नहीं होता; पर बहुत से आचार्य कहते है कि सिद्धियों से जो शक्ति या जानकारी प्राप्त होती है, बिना उस पर मानसिक परिश्रम और तर्क किये ( यानी बिना उन तथ्यों और शक्ति के द्वारा विचार-संघर्ष किये) ज्ञान की प्राप्ति असम्भव है। सिद्धियाँ शक्ति देती है, ज्ञान नहीं और ज्ञान के बिना मुक्ति असम्भव है।

जिस कुण्डलिनी के चक्र को, जिस शिवलिंग को हम मुक्ति और ऐश्वर्य का मार्ग मानते है; वे इस श्री चक्र के विज्ञान से सम्बन्धित है।

इसलिए यह यंत्र सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण यंत्र है। यह एक ही यंत्र परा विज्ञान के समस्त रहस्यों को बताने वाला और समस्त शक्तियों की सिद्धि की चाभी है।

इस यंत्र में एक अति महत्त्व पूर्ण संरचना ‘बिंदु’ है। यह कर्णिका का मध्य होता है। यह षट्कोण , त्रिकोण, नव कोण आदि का मध्य है। इसमें तीन वृत्त होते है। वास्तविक बिंदु अंदर का सफेद वृत्त होता है। उसके उपर एक पट्टी रहती है और उसके ऊपर एक पट्टी। बीच में सदाशिव (परमतत्व/ परमात्मा), उसके बाहर शिव-पार्वती होते है। पहले शिव, फिर पार्वती।

इन यंत्रों पर कोई भी पूजा तीनो रूपों में होती है। बिंदु से प्रारंभ करके केंद्र प्रसारी (बायें से दायें ऊपर से) , भुपूर से बिंदु की ओर केन्द्राभिगामी (दायें से बाये ऊपर से) , केवल मध्य बिंदु और त्रिकोण पहली सृष्टिक्रम है, दूसरी संहार क्रम है , तीसरी स्थिति क्रम है। पहली प्राप्ति के लिए , दूसरी मुक्ति के लिए, तीसरी भोग के लिए की जाती है।

यहाँ एक स्ट्रक्चर सम्बन्धी भिन्नता भी शास्त्रीय वर्णनों में प्राप्त होती है। एक पहले अधोगामी त्रिभुज की उत्पत्ति मानता है, दूसरा उर्ध्वगामी। प्रमाण उर्ध्व गामी के मिलते है , अधोगामी के नहीं। इसलिए यह मत ही मानना पड़ता है कि पहले ‘योनि’ ( एक संरचना, जिस पर – चार्ज होता है) उत्पन्न हुई, उसकी प्रतिक्रिया में लिंग की उत्पत्ति हुई; दोनों के मिलने से महामाया शक्ति ‘श्री’ की उत्पत्ति हुई, जिसके हृदय में उसकी केंद्रीय शक्ति राजराजेश्वरी भोग प्रिय ‘शिव’ की उत्पति हुई। उनकी ही कामना से उनके शरीर के दोनों ‘योनि-लिंग’ लगातार समागम कर रहे अहि, इसी से सृष्टि है। यह व्याख्या सभी इकाइयों पर व्याप्त है। शरीर ही योनि-लिंग समागम से है। ये चक्की के दो पाट है। -,- ऊर्जाक्षेत्र के पाट । केंद्र में अर्द्धनारीश्वर है। (शिव पार्वती) अपने केंद्र में राजराजेश्वरी को लिए (शैव मार्ग) में सर्वत्र शिव-पार्वती होते है । प्रकृति में स्वतंत्र सत्ता इनमें से किसी की नहीं होती। + की उत्पत्ति , – के कारण होती है। एक उत्पन्न होगा, दूसरा भी होगा वर्ना उत्पत्ति नष्ट होगी या उत्पत्ति स्थल। उर्ध्व गामी का प्रमाण यह है कि मूलाधार नीचे होता है, शीर्ष सहस्त्रार ऊपर। यही क्रम सभी साधनाओं में माना जाता है। मूलाधार या मूल आधार ही वह नेगेटिव बेस है , जिसपर सारा अस्तित्त्व होता है। राजराजेश्वरी शिव ह्रदय केंद्र यानी धूरी के केंद्र में होती है। मस्तिष्क में भी शिव पार्वती रहते है , पर यहाँ वे शिव नितांत वैरागी है। पार्वती दया-ममता वाली –युक्ति लगातार कल्याण करने वाली।
यह मस्तिष्क के ही दो हिस्से है। एक बिंदु के चारों ओर , दूसरा उसके चारों ओर। रश्मियाँ इस बाहरी वृत्त से निकलती है। मस्तिष्क का निर्माण भी इसी वृत्त की एक संरचना से होता है। रश्मियाँ वैचारिक लहरें उत्पन्न करती है। इससे जिज्ञासा, बुद्धि, विचार शक्ति आदि उत्पन्न होते है।
आप मुसीबत में हो; तो मस्तिष्क शिव से पूछता है। आपने जो उसे दिया है, उस जानकारी के अनुसार वह रिजल्ट बता देता है। कुछ अन्हीं मामूल हुआ तो वह आपसे पूछता है और आपको जानकारी प्राप्त करने के रास्ते भी बताता है।

पर नीचे जो केंद्र में शिव बैठा है वही राजा है और भोक्ता है। वह भोगवादी , स्वार्थी और लालची , अहंकारी सभी है । उसे अच्छा न लगे, तो वह मस्तिष्क के फैसले को रिजेक्ट करके , उसे बेईमानी , छल आदि करने को कहता है। वह करता है। उसे कोई मतलब नहीं है कि आप नर्क में जाते है कि स्वर्ग में और आपका छल असफल होगा या सफल। लेकिन नहीं। वह सावधान करता है । हर ऐसा काम जो शंकित है, उसके परिणाम दर्शाता है, परआप फाइनल कर लते है , उसकी मानते ही नहीं। इसीलिए ज्योतिष में कहा जाता है कि बृहस्पति और चन्द्रमा का पुत्र बाप के कहे को नहीं मानता। वह छल, बल, निति को मनोकामना पूर्ती में प्रयुक्त करता अहि।

इसे आप धार्मिक कथा समझिये , पर यह एक सिस्टम है। एक वैज्ञानिक सिस्टम, जो प्रकृति की हर इकाई पर व्याप्त है। इस सिस्टम पर ही हमारा सारा आध्यात्मिक , तांत्रिक, ज्योतिष, वास्तु, मन्दिर, देवी, पूजा ,यज्ञ आदि सभी कुछ टिका हुआ है।

श्री चक्र उसी सिस्टम क आउटर टू.डी. स्केच है। यंत्रों को पूजा हेतु कागज पर बनाकर प्राण प्रतिष्ठित (सिद्ध) किया जाए या धरती-धातु पर। उसमें रंगों, उसके उपयोगों और देवी-देवता का ध्यान रखना, सिद्धिकाल का ध्यान रखना जरूरी है। किस देवता या शक्ति के लिए कैसा श्री यंत्र बनाना चहिये, किस समयकाल मुहूर्त में बनाना चाहिए आदि कई बातों का पालन करके इसकी प्राण प्रतिष्ठा करनी होती है।

 

Sunday, April 3, 2016

शिवपूजाकी विशेषताएं

१. शिवपूजाकी विशेषताएं   हालाहल प्राशन कर विश्वको विनाशसे बचानेवाले, देव व दानव दानोंद्वारा उपास्य, सहज प्रसन्न होनेवाले, भूतोंके स्वामी, नृत्य व नाट्य कलाओंके प्रवर्तक, योगमार्गके प्रणेता इत्यादि विशेषताओंसे युक्त महादेव अर्थात् भगवान शिव जगत्पिताके गौरान्विवित किए जाते हैं । वेद, शास्त्र, पुराण तथा तंत्रग्रंथोंमें शिवजीके गौरवगान, लीला व उपदेशका वर्णन है । फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशीको महाशिवरात्रि कहते हैं । इस व्रतके प्रधान देवता हैं, शिव । इस दिन संपूर्ण भारतवर्षमें शिवजीकी उपासना की जाती है । अधिकांश लोगोंको शिवजीसे संबंधित जो थोडी-बहुत जानकारी है, वह बचपनमें पढी या सुनी गई कहानियोंद्वारा होती है । किसी भी देवता व उनके पूजनसे संबंधित अधिक जानकारी प्राप्त होनेपर विश्वास बढता है । शिवभक्तोंके लिए शिवजीसे संबंधित जानकारी यहां दे रहे हैं । यदि देवतासे संबंधित जानकारीके साथ-साथ अध्यात्मशास्त्रकी जानकारी भी हो, तो साधना अधिक योग्य ढंगसे हो सकती है । इसके लिए जिज्ञासु सनातन संस्था-निर्मित अध्यात्मशास्त्र विषयक ग्रंथों व सत्संगोंका लाभ ले सकते हैं । २. महाशिवरात्रि व्रतकी पद्धति व विधि   फाल्गुन कृष्ण त्रयोदशीको महाशिवरात्रिका व्रत रखा जाता है । इस तिथिपर एकभुक्त रहें । चतुर्दशीके दिन प्रात:काल व्रतका संकल्प करें । सायंकाल शास्त्रोक्त स्नान करें । भस्म और रुद्राक्ष धारण करें । प्रदोषकालमें शिवजीके मंदिर जाएं । शिवजीका ध्यान करें । तदुपरांत षोडशोपचार पूजा करें । भवभवानीप्रीत्यर्थ (यहां भव यानी शिव) तर्पण करें । नाममंत्र जपते हुए शिवजीको एक सौ आठ कमल अथवा बिल्वपत्र अर्पण करें । पुष्पांजलि अर्पण कर, अर्घ्य दें । पूजासमर्पण, स्तोत्रपाठ तथा मूलमंत्रका जाप हो जाए, तो शिवजीके मस्तकपर चढाए गए फूल लेकर अपने मस्तकपर रखें और शिवजीसे क्षमायाचना करें । चतुर्दशीपर रात्रिके चारों प्रहरोंमें चार पूजा करनेका विधान है, जिसे यामपूजा कहा जाता है । प्रत्येक यामपूजामें देवताको अभ्यंगस्नान कराएं, अनुलेपन करें, साथ ही धतूरा, आम तथा बिल्वपत्र अर्पण करें । चावलके आटेके २६ दीप जलाकर देवताकी आरती उतारें । पूजाके अंतमें १०८ दीप दान करें । प्रत्येक पूजाके मंत्र भिन्न होते हैं; मंत्रों सहित अर्घ्य दें । नृत्य, गीत, कथाश्रवण आदि करते हुए जागरण करें । प्रात:काल स्नान कर, पुन: शिवपूजा करें । पारण अर्थात् व्रतकी समाप्तिके लिए ब्राह्मणभोजन कराएं । (पारण चतुर्दशी समाप्त होनेसे पूर्व ही करना योग्य होता है ।) ब्राह्मणोंके आशीर्वाद प्राप्त कर व्रत संपन्न होता है । बारह, चौदह अथवा चौबीस वर्ष जब व्रत हो जाए, तो उद्यापन करें । ३. महाशिवरात्रिपर शिवजीका नामजप करनेका महत्त्व   अनेक संतोंने कहा है, कलियुगमें नामजप ही सर्वोत्तम साधना है । नामजप हम उठते-बैठते, जागते-सोते, आते-जाते भी कर सकते हैं । विश्वमें बढे हुए तमोगुणसे रक्षा होने हेतु तथा शिवरात्रिपर वातावरणमें प्रक्षेपित शिवतत्त्व आकर्षित करनेके लिए महाशिवरात्रिपर शिवजीका `ॐ नम: शिवाय’ यह नामजप अधिकाधिक करें । ४. शिवपूजाकी विशेषताएं   पूजाके लिए कहां बैठें ?: आम तौरपर शिवमंदिरमें पूजा एवं साधना करनेवाले श्रद्धालुगण शिवजीकी तरंगोंको सीधे अपने शरीरपर नहीं लेते; क्योंकि इससे कष्ट होता है । शिवजीके मंदिरमें अरघाके स्रोतके ठीक सामने न बैठकर, एक ओर बैठते हैं; क्योंकि शिवकी तरंगें सामनेकी ओरसे न निकलकर, अरघाके स्रोतसे बाहर निकलती हैं ।   शिवपिंडीको ठंडे जल, दूध अथवा पंचामृतसे स्नान करवाते हैं ।   शिवपूजामें हलदी-कुमकुमका प्रयोग नहीं करते; भस्म तथा श्वेत अक्षतका प्रयोग करते हैं ।   पिंडीके दर्शनीय भागपर भस्मकी तीन समांतर धारियां बनाते हैं या फिर समांतर धारियां खींचकर उनके मध्य एक वर्तुल बनाते हैं । उसे शिवाक्ष अथवा योगाक्ष भी कहते हैं । शिवाक्षपर चावल, क्वचित गेहूं एवं श्वेत पुष्प चढाते हैं ।   शिवपिंडीकी पूर्ण प्रदक्षिणा न कर, अर्धचंद्राकृति प्रदक्षिणा करते हैं । अरघेके स्रोतको लांघते नहीं, क्योंकि वहां शक्तिस्रोत होता है । उसे लांघते समय पैर फैलते हैं, जिससे वीर्यनिर्मिति व पांच अंतस्थ वायुओंपर विपरीत परिणाम होता है ।  रुद्राक्ष: भगवान शिव निरंतर समाधिमें होते हैं, इस कारण उनका कार्य सदैव सूक्ष्मसे ही जारी रहता है । यह कार्य अधिक सुव्यवस्थित हो, इसके लिए भगवान शिवने भी रुद्राक्षकी माला शरीरपर धारण की है । इसी कारण शिव-उपासनामें रुद्राक्षका असाधारण महत्त्व है ।’ किसी भी देवताका जप करने हेतु रुद्राक्षमालाका प्रयोग किया जा सकता है । रुद्राक्षमालाको गलेमें या अन्यत्र धारण कर किया गया जप, बिना रुद्राक्षमाला धारण किए गए जपसे हजार गुना लाभदायक होता है । इसी प्रकार अन्य किसी मालासे जप करनेकी तुलनामें रुद्राक्षकी मालासे जप करनेपर दस हजार गुना अधिक लाभ होता है ।  ५. असली रुद्राक्ष कैसे पहचानें ?  असली रुद्राक्ष नकली रुद्राक्ष १. आकार मछली समान चपटा गोल २. रंग (आकाशकी लालिमा समान) पक्‍का पानीमें धुल जाता है ३. पानीमें डालनेपर सीधे नीचे जाता है तैरता है अथवा हिलते- डुलते नीचे जाता है ४. आर-पार छिद्र होता है सुईसे करना पडता है ५. तांबेके बर्तनमें अथवा पानीमें      डालनेपर गोल-गोल घूमना होता है नहीं ६. कुछ समय बाद कीट लगना नहीं लगते लगते हैं ७. मूल्‍य (सन्‌ १९९७ में) रु. ४,००० से ४०,००० रु. २० से २०० ८. कौनसी तरंगें ग्रहण करता है? सम (सत्त्‍व)       –

१. शिवपूजाकी विशेषताएं



हालाहल प्राशन कर विश्वको विनाशसे बचानेवाले, देव व दानव दानोंद्वारा उपास्य, सहज प्रसन्न होनेवाले, भूतोंके स्वामी, नृत्य व नाट्य कलाओंके प्रवर्तक, योगमार्गके प्रणेता इत्यादि विशेषताओंसे युक्त महादेव अर्थात् भगवान शिव जगत्पिताके गौरान्विवित किए जाते हैं । वेद, शास्त्र, पुराण तथा तंत्रग्रंथोंमें शिवजीके गौरवगान, लीला व उपदेशका वर्णन है । फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशीको महाशिवरात्रि कहते हैं । इस व्रतके प्रधान देवता हैं, शिव । इस दिन संपूर्ण भारतवर्षमें शिवजीकी उपासना की जाती है । अधिकांश लोगोंको शिवजीसे संबंधित जो थोडी-बहुत जानकारी है, वह बचपनमें पढी या सुनी गई कहानियोंद्वारा होती है । किसी भी देवता व उनके पूजनसे संबंधित अधिक जानकारी प्राप्त होनेपर विश्वास बढता है । शिवभक्तोंके लिए शिवजीसे संबंधित जानकारी यहां दे रहे हैं । यदि देवतासे संबंधित जानकारीके साथ-साथ अध्यात्मशास्त्रकी जानकारी भी हो, तो साधना अधिक योग्य ढंगसे हो सकती है । इसके लिए जिज्ञासु सनातन संस्था-निर्मित अध्यात्मशास्त्र विषयक ग्रंथों व सत्संगोंका लाभ ले सकते हैं ।

२. महाशिवरात्रि व्रतकी पद्धति व विधि



फाल्गुन कृष्ण त्रयोदशीको महाशिवरात्रिका व्रत रखा जाता है । इस तिथिपर एकभुक्त रहें । चतुर्दशीके दिन प्रात:काल व्रतका संकल्प करें । सायंकाल शास्त्रोक्त स्नान करें । भस्म और रुद्राक्ष धारण करें । प्रदोषकालमें शिवजीके मंदिर जाएं । शिवजीका ध्यान करें । तदुपरांत षोडशोपचार पूजा करें । भवभवानीप्रीत्यर्थ (यहां भव यानी शिव) तर्पण करें । नाममंत्र जपते हुए शिवजीको एक सौ आठ कमल अथवा बिल्वपत्र अर्पण करें । पुष्पांजलि अर्पण कर, अर्घ्य दें । पूजासमर्पण, स्तोत्रपाठ तथा मूलमंत्रका जाप हो जाए, तो शिवजीके मस्तकपर चढाए गए फूल लेकर अपने मस्तकपर रखें और शिवजीसे क्षमायाचना करें । चतुर्दशीपर रात्रिके चारों प्रहरोंमें चार पूजा करनेका विधान है, जिसे यामपूजा कहा जाता है । प्रत्येक यामपूजामें देवताको अभ्यंगस्नान कराएं, अनुलेपन करें, साथ ही धतूरा, आम तथा बिल्वपत्र अर्पण करें । चावलके आटेके २६ दीप जलाकर देवताकी आरती उतारें । पूजाके अंतमें १०८ दीप दान करें । प्रत्येक पूजाके मंत्र भिन्न होते हैं; मंत्रों सहित अर्घ्य दें । नृत्य, गीत, कथाश्रवण आदि करते हुए जागरण करें । प्रात:काल स्नान कर, पुन: शिवपूजा करें । पारण अर्थात् व्रतकी समाप्तिके लिए ब्राह्मणभोजन कराएं । (पारण चतुर्दशी समाप्त होनेसे पूर्व ही करना योग्य होता है ।) ब्राह्मणोंके आशीर्वाद प्राप्त कर व्रत संपन्न होता है । बारह, चौदह अथवा चौबीस वर्ष जब व्रत हो जाए, तो उद्यापन करें ।

३. महाशिवरात्रिपर शिवजीका नामजप करनेका महत्त्व



अनेक संतोंने कहा है, कलियुगमें नामजप ही सर्वोत्तम साधना है । नामजप हम उठते-बैठते, जागते-सोते, आते-जाते भी कर सकते हैं । विश्वमें बढे हुए तमोगुणसे रक्षा होने हेतु तथा शिवरात्रिपर वातावरणमें प्रक्षेपित शिवतत्त्व आकर्षित करनेके लिए महाशिवरात्रिपर शिवजीका `ॐ नम: शिवाय’ यह नामजप अधिकाधिक करें ।

४. शिवपूजाकी विशेषताएं



पूजाके लिए कहां बैठें ?: आम तौरपर शिवमंदिरमें पूजा एवं साधना करनेवाले श्रद्धालुगण शिवजीकी तरंगोंको सीधे अपने शरीरपर नहीं लेते; क्योंकि इससे कष्ट होता है । शिवजीके मंदिरमें अरघाके स्रोतके ठीक सामने न बैठकर, एक ओर बैठते हैं; क्योंकि शिवकी तरंगें सामनेकी ओरसे न निकलकर, अरघाके स्रोतसे बाहर निकलती हैं ।


शिवपिंडीको ठंडे जल, दूध अथवा पंचामृतसे स्नान करवाते हैं ।


शिवपूजामें हलदी-कुमकुमका प्रयोग नहीं करते; भस्म तथा श्वेत अक्षतका प्रयोग करते हैं ।


पिंडीके दर्शनीय भागपर भस्मकी तीन समांतर धारियां बनाते हैं या फिर समांतर धारियां खींचकर उनके मध्य एक वर्तुल बनाते हैं । उसे शिवाक्ष अथवा योगाक्ष भी कहते हैं । शिवाक्षपर चावल, क्वचित गेहूं एवं श्वेत पुष्प चढाते हैं ।


शिवपिंडीकी पूर्ण प्रदक्षिणा न कर, अर्धचंद्राकृति प्रदक्षिणा करते हैं । अरघेके स्रोतको लांघते नहीं, क्योंकि वहां शक्तिस्रोत होता है । उसे लांघते समय पैर फैलते हैं, जिससे वीर्यनिर्मिति व पांच अंतस्थ वायुओंपर विपरीत परिणाम होता है ।

रुद्राक्ष: भगवान शिव निरंतर समाधिमें होते हैं, इस कारण उनका कार्य सदैव सूक्ष्मसे ही जारी रहता है । यह कार्य अधिक सुव्यवस्थित हो, इसके लिए भगवान शिवने भी रुद्राक्षकी माला शरीरपर धारण की है । इसी कारण शिव-उपासनामें रुद्राक्षका असाधारण महत्त्व है ।’ किसी भी देवताका जप करने हेतु रुद्राक्षमालाका प्रयोग किया जा सकता है । रुद्राक्षमालाको गलेमें या अन्यत्र धारण कर किया गया जप, बिना रुद्राक्षमाला धारण किए गए जपसे हजार गुना लाभदायक होता है । इसी प्रकार अन्य किसी मालासे जप करनेकी तुलनामें रुद्राक्षकी मालासे जप करनेपर दस हजार गुना अधिक लाभ होता है ।

५. असली रुद्राक्ष कैसे पहचानें ?

असली रुद्राक्षनकली रुद्राक्ष
१. आकारमछली समान चपटागोल
२. रंग (आकाशकी लालिमा समान)पक्‍कापानीमें धुल जाता है
३. पानीमें डालनेपरसीधे नीचे जाता हैतैरता है अथवा हिलते-
डुलते नीचे जाता है
४. आर-पार छिद्र
होता हैसुईसे करना पडता है
५. तांबेके बर्तनमें अथवा पानीमें
     डालनेपर गोल-गोल घूमना
होता हैनहीं
६. कुछ समय बाद कीट लगनानहीं लगतेलगते हैं
७. मूल्‍य (सन्‌ १९९७ में)रु. ४,००० से
४०,०००
रु. २० से २००
८. कौनसी तरंगें ग्रहण करता है?सम (सत्त्‍व)      –

Wednesday, March 2, 2016

जिस शिव भक्त ऋषि से यम भी हार गए, जानिए कैसे उनके आगे मृत्यु ने सर झुका लिया

जिस शिव भक्त ऋषि से यम भी हार गए, जानिए कैसे उनके आगे मृत्यु ने सर झुका लिया

जो पैदा होता है वह मृत्यु को प्राप्त होता ही है, जो जीवित है वह एक ना एक दिन नष्ट होकर ही रहेगा। मृत्यु तो एक मंजिल है जहां हम सब जाएंगे ही जाएंगे, अब वो चाहे छोटा हो या बड़ा, राजा हो या फकीर, मूर्ख हो या ऋषि, मृत्यु तो सबको लेकर ही जाएगी।

Lord-Shiva-जिस शिव भक्त ऋषि से यम भी हार गए, जानिए कैसे उनके आगे मृत्यु ने सर झुका लिया

कोई भी आज तक मृत्यु पर विजय प्राप्त नहीं कर पाया। किंतु आज हम आपको एक ऐसी कहानी बताने जा रहे हैं जिसको पढ़ कर आप अवश्य आश्चर्यचकित रह जाएंगे। यह कहानी है एक ऋषि की जिन्होंने ना केवल अपनी मृत्यु पर विजय हासिल की अपितु स्वयम यमराज भी उनके सामने आकर विवश हो गए और उनके प्राण ना ले सके।

यह कहानी एक भ्रगु ऋषि के वंशज की है जिनका नाम था ऋषि मृकंदु।
ऋषि मृकंदु और उनकी पत्नी भगवान शिव के बहुत बड़े भक्त थे। ऋषि मृकंदु संतानहीन थे, संतान प्राप्ति के लिए इन्होंने भगवान शिव का कठोर तप किया और तप से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने ऋषि मृकंदु को पुत्र वरदान दिया, लेकिन यह भी कहा कि उनके पुत्र की आयु केवल 16 वर्ष होगी।

वरदान प्राप्ति के कुछ ही दिनों बाद मृकंदु ऋषि की पत्नी ने एक तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया उस बालक का नाम था मार्कंडेय। वह बालक बचपन से ही तेज बुद्धि का स्वामी था और छोटी सी आयु में ही उन्होंने सभी वेदों और पुराणों का अध्ययन कर लिया था जैसे जैसे उनकी उमर बढ़ती, वैसे ही उनका ज्ञान भी ऊपर उठता गया। लेकिन उमर के साथ साथ उनके माता-पिता की चिंता बढ़ती जा रही थी क्योंकि भगवान शिव ने पहले से ही कह दिया था तुम्हारे बालक की उम्र केवल 16 वर्ष होगी।
Markandeya_Lord-Shiva-जिस शिव भक्त ऋषि से यम भी हार गए, जानिए कैसे उनके आगे मृत्यु ने सर झुका लिया

माता पिता को यूं विवश देख कर मार्कंडेय ने शिव की आराधना करने का निर्णय लिया। अब वो पूरा दिन ही शिव भक्ति में लीन रहने लगे। इसी तरह दिन गुजरे, वर्ष गुजरे और उनकी आयु 16 वर्ष की हो गई। जैसे की भविष्यवाणी हुई थी उनकी मृत्यु का समय आ चुका था। माता पिता दोनों दुख के सागर में डूब गए।
जब यम के दूत उन्हें लेने के लिए आए तब भी मार्कंडेय शिव आराधना में लीन थे। यम के दूतों ने बहुत प्रयास किया किंतु वह उनके प्राण ना ले सके।
जब यमदूतो से कुछ ना हो पाया तो वह यमराज के पास चले गए और उनको सब वाक्य बताएं। यमराज क्रोधित हो कर स्वयम मार्कंडेय के प्राण लेने हेतु उसके पास गए। उस समय भी मार्कंडेय शिव भक्ति में लीन थे। जब यमराज ने यह देखा तो और भी क्रोधित हो गए क्योंकि मार्कंडेय को मृत्यु का भय ही नहीं था। यमराज ने मार्कंडेय पर अपनी गधा से प्रहार किया, किंतु वह प्रहार मार्कंडेय को ना लगा और वह प्रहार उस शिवलिंग को लगा जिसकी मार्कंडेय पूजा कर रहे थे। गधा के प्रहार से वह शिवलिंग टूट गया और उसी समय वहा भगवान शिव प्रकट हुए। भगवान शिव ने यमराज को क्षमा प्रदान करते हुए मार्कंडेय को उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर उसे जीवन दान में दिया। इस प्रकार उनकी मृत्यु टल गई और उन्होंने मृत्यु पर विजय प्राप्त कर ली। मार्कंडेय ऋषि बहुत वर्षों तक जीवित रहे। मार्कंडेय पुराण की रचना भी ऋषि मार्कंडेय ने ही की थी।
मार्कंडेय की मृत्यु को जीवन में तब्दील करने पर ही भगवान शिव का नाम कालांतक पड़ा, जिसका अर्थ होता है काल का अंत करने वाला। 
जय शंभू! हर हर महादेव!

कौन है वह जो 3000 वर्षों से धरती पर भटक रहा है धर्म की रक्षा हेतु धर्म युद्ध के लिए जो आज भी जीवित है

कौन है वह जो 3000 वर्षों से धरती पर भटक रहा है धर्म की रक्षा हेतु धर्म युद्ध के लिए जो आज भी जीवित है

यह एक उस इन्सान के बारे में कहानी है जिसके बारे में कहा जाता है कि वो धरती पर 5000 से 6000 वर्षों तक जीवित रहेगा। कुछ लोग मानते हैं कि वह 3000 वर्षों तक धरती में अलग-अलग इन्सान के रुप लेकर यहां से वहां भटकता रहेगा। बहुत से लोगों का ऐसा भी मानना है कि यह जीवित है किसी एक बड़े धर्म युद्ध के लिए।

Ashwathama-कौन है वह जो 3000 वर्षों से धरती पर भटक रहा है धर्म की रक्षा हेतु धर्म युद्ध के लिए जो आज भी जीवित है

अलग-अलग लोगों की अलग-अलग मान्यता है। यह वह इंसान है जो महाभारत काल से जीवित है, और आज भी कई लोगों को दिखाई देते हैं। महाभारत काल से लेकर आज तक यह योद्धा धरती के अलग-अलग स्थानों पर भटक रहा है।
मगर ऐसा क्यों? क्या सच में यह एक धर्म युद्ध के लिए जीवित है? दयावान भगवान ने ऐसे योद्धा को इतना गंभीर श्राप क्यों दिया?
महाभारत युद्ध में ऐसी क्या गलती की थी इस योद्धा ने जिसका इसको इतना बड़ा मूल्य चुकाना पड़ रहा है? महाभारत युद्ध में तो बड़े-बड़े छल हुए थे, पाप हुए थे, तो किसी और को तो ऐसी सजा नहीं मिली!
अगर भगवान कृष्ण पर आपका अटूट विश्वास है और आप मानते हैं कि भगवान कृष्ण तो गलती कर नहीं सकते, तो आप भी जानते होंगे इसके पीछे भी कोई-न-कोई कारण अवश्य रहा होगा।
और अगर आप ऐसा सोच रहे हैं तो आप बिल्कुल सही है, भगवान कृष्ण ने बहुत आगे की सोच कर ही इस योद्धा को ऐसा श्राप दिया।
कौन है वह महान योद्धा जो ऐसे धरती पर यहां से वहां भटक रहा है? क्या है उसका नाम?
अर्जुन ने अपनी तलवार से अश्वत्धामा के सिर के केश काट डालें और उसके मस्तक से मनी निकाल डाली जिसके कारण वह श्रीहीन हो गया। उसके पश्चात भगवान श्री कृष्ण ने अश्वत्धामा को 6000 वर्ष तक यूंही भटकने का श्राप दिया। केश काटने के पश्चात अर्जुन ने अश्वत्धामा को अपने शिविर से बाहर निकाल दिया। जिस कारण से इस महान योद्धा का नाम महाभारत की हिंसा और अभिशाप में खों सा गया।
इसके पीछे का कारण
कहानी कुछ इस प्रकार है कि एक बार तो सब ने अश्वधामा को माफ करने को कहा किंतु भगवान श्रीकृष्ण ने उसको धरती पर भटकने का श्राप दे दिया। ऐसा क्या हुआ था की भगवान श्री कृष्ण ने उसे माफ़ ना करते हुए श्राप दे दिया?
इसका जवाब हमें भविष्य पुराण में मिलता है…
कौन है वह जो 3000 वर्षों से धरती पर भटक रहा है धर्म की रक्षा हेतु धर्म युद्ध के लिए जो आज भी जीवित है
सनातन धर्म की पुस्तक भविष्य पुराण में लिखा गया है कि आने वाले वक्त में सनातन धर्म पर घोर संकट आएगा। तब इंसानों की सोच बहुत गिर चुकी होगी और संसार हर तरफ से सनातन धर्म को समाप्त करने की कोशिश में लगा होगा।  यह वक्त कलयुग के अंत में होगा।
ऐसा कहा जाता है की उस समय ही भगवान विष्णु का “कल्कि” अवतार आएगा और उस समय कल्कि अवतार की सेना में अश्वत्थामा भी मौजूद होंगे।
ऐसा केवल भविष्य पुराण में ही नहीं है बल्कि अलग अलग पुराणों में इसका जिक्र किया गया है जिसमें यह भी कहा गया है कि जो लोग हजारों वर्षों से जीवित है और यहां वहां भटक रहे हैं यह सब कल्कि भगवान की सेना में शामिल होकर अधर्म के विरुद्ध युद्ध लड़ेंगे।

जानिए किस भारतीय ने खोजा 1500 साल पहले मंगल पर पानी जानकार चकित रह जायेंगे आप

जानिए किस भारतीय ने खोजा 1500 साल पहले मंगल पर पानी जानकार चकित रह जायेंगे आप
मंगल पर पानी ढूंढने का प्रयास जोर शोर से यूएस के वैज्ञानिक संस्थान नासा और भारत का इसरो काफी समय से कर रहे हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं मंगल पर पानी का उल्लेख 1500 साल पहले ही भारत के एक वैज्ञानिक ने अपनी किताब में कर दिया था। वह महान खगोलविद् वराह मिहिर थे। वैज्ञानिक आज भी उनकी रिसर्च देखकर हैरान हो जाते हैं। उनका जन्म उज्जैन जिले के कपिथा गांव में हुआ था।

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वराह मिहिर के बारे में कुछ रोचक जानकारियां
– वराह मिहिर का जन्म सन 499 मे उज्जैन के एक छोटे से गांव कपिथा में हुआ।

– उनके पिता आदित्यदास सूर्यदेव के बहुत बड़े उपासक हुआ करते थे।

– बचपन से ही वराह मिहिर की रूची गणित एवम ज्योतिष में रही और उसी में उन्होंने शोध किया।

– उनके योगदान में समय मापक, गट्टी यंत्र, इंद्रप्रस्थ में लोह स्तंभ और वेदशाला की स्थापना शामिल है।

-उन्होंने सबसे पहले जो ग्रंथ पूर्ण किया वह था सूर्य सिद्धांत जो किसी कारणवश अभी उपलब्ध नहीं है।

– उसी सूर्य सिद्धांत ग्रंथ में इन्होंने मंगल की विशेषताओ का उल्लेख किया था।

– महान खगोलविद् वराह मिहिर ने आज से करीब 1515 साल पहले सूर्य सिद्धांत ग्रन्थ को रचा था।

– इसी ग्रन्थ में उंन्होने मंगल के अर्धव्यास के बारे में लिखा है।

– 2004 में नासा ने रोवर सैटेलाइट से मंगल पर पानी और लोहे का पता लगाया था।
– वराह मिहिर पुराणो का अध्यन कर अपने सूर्य सिद्धांत में मंगल पर पानी और लोहे का जिक्र किया था।

– आज के विज्ञानं के अनुसार सौरमंडल के सभी ग्रहों की उत्पत्ति सूर्य से ही हुई है और वराह मिहिर ने भी यही लिखा था की सभी ग्रहो की उत्पत्ति सूर्य से हुई है और मंगल भी सूर्य की संवर्धन किरण से जन्मा है।

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जब चोरी हो गया सूर्य सिद्धांत
वराह मिहिर ने सूर्य सिद्धांत में वैज्ञानिक आधार पर खगोलीय गणना की है।  यह ग्रंथ समय में कहीं गुम गया। ऐसा कहां जाता है कि इस ग्रंथ को चोरी कर लिया गया,  उसके पश्चात अनेक विद्वानों ने मिलकर सूर्य सिद्धांत को पुनः लिपिबद्ध कर उनकी रिसर्च को आगे बढ़ाने का काम किया।  अब यह पुस्तक पूरे विश्व में अनेक भाषाओ में उपलब्ध है। वराह मिहिर की गन्नाओ का तुलनात्मक अध्यन नासा के मंगल अभियान के समय भी रिटायर्ड आईपीएस अरुण उपाध्याय ने किया।  बाद में उन्होंने इस पर किताब भी लिखी और वह अब भारत के मंगल अभियान के डाटा का अध्ययन भी करते हैं।
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भारत के इतिहास में मंगल का अध्ययन
भारतीय खगोलविदो ने कइ समय पूर्व ही मंगल सहित अन्य सौर ग्रहों का अध्यन वैज्ञानिक रूप से कर लिया।  आप आज भी इन्हे सूर्य सिद्धांत, गरुण पुराण, श्रीमद्भागवत पुराण, मत्स्य पुराण, अग्नि पुराण में पढ़ा सकते है।  पुराणों के इलावा आप वराह मिहिर, भास्कर चार्य तथा आर्यभट्ट की रचनाओं में भी इसका उल्लेख पढ़ सकते हैं।  यह सभी सिद्धांत 1500 से 2000 साल पुराने हैं।  भारतीय खगोल विदो की गणना का माप योजन में है, जो आधुनिक माप में 12.75 किमी के बराबर है।
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वैज्ञानिकों को गुजरात के समुद्र में मिला जिससे हुआ था समुद्र मंथन, वैज्ञानिकों ने भी की पुष्टि

वैज्ञानिकों को गुजरात के समुद्र में मिला जिससे हुआ था समुद्र मंथन, वैज्ञानिकों ने भी की पुष्टि
हिंदू धर्म में तो अनेक कथाएं है और हर कथा एक बहते ज्ञान की नदी की तरह है जिस से हम सबको कुछ ना कुछ सीखने को मिलता है। उसमें से एक कथा है समुंद्र मंथन की जहां देवताओं और असुरों ने नागराज वासुकी और मंदराचल पर्वत की सहायता से समुंद्र को मथा था और उसी मंथन से लक्ष्मी, चंद्रमा, अप्सराएं और भगवान धनवंतरि अमृत लेकर निकले थे।

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लेकिन आज कुछ ऐसा समय है कि हिंदू धर्म को मानने वाले ही अपनी उन पुराणिक कथाओं को काल्पनिक समझते हैं, किंतु बहुत सारी हिंदू कथाएं ऐसी भी है जिनको विज्ञान खुद सत्य मानता है और उनमें से एक है समुद्र मंथन की कथा जिसका हाल ही में सत्य होने का प्रमाण मिला है।

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आर्कियोलॉजी और ओशनोलॉजी डिपार्टमेंट ने समुद्र मंथन जिस पर्वत से किया था उस पर्वत को खोज निकाला है। गुजरात के समीप ही समुद्र में यह पर्वत मिला। वैज्ञानिकों ने इस बात की पुष्टि भी कर दी है की यह मंदराचल पर्वत ही है।
इस पर्वत का जिक्र विष्णु पुराण और भागवत पुराण में किया गया है। सूरत में स्थित एक छोटे से पिंजरात गांव के समुंदर में यह पर्वत पाया गया है, इस पर्वत के ऊपर नाग देवता की आकृति भी पाई गई है, यह आकृति पर्वत के बीचो-बीच बनी है।

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इस पर्वत का मितुल त्रिवेदी ने, जो की सूरत के आर्केलॉजिस्ट है, जब कार्बन टेस्ट किया तो नतीजे चौका देने वाले निकले। समुंद्र में पाए जाने वाले पर्वतो से बहुत भिन्न था। इस पर्वत की खोज असल में 1988 में हुई थी तब डॉ. एस.आर.राव इस साइट पर शोध कर रहे थे और मितुल त्रिवेदी उनके सहयोगी थे। पर तब शोध चल रहा था और इस बात की पुष्टि नहीं हुई थी की यह समुंद्र मंथन वाला पर्वत है।
इस पर्वत पर गहन अध्यन करने के बाद इस बात की पुष्टि की गयी की यह समुन्द्र मंथन वाला ही पर्वत है। इस पर्वत में ग्रेनाइट की मात्रा भी अधिक पाई गयी है जो इसे समुंद्र के बाकी पर्वतो से भिन्न करता है।
ओशोनोलॉजी डिपार्टमेंट भी इस खोज से बेहद उत्साह में है और उन्होंने इस पर्वत की पुष्टि अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर भी साँझा की।

Sunday, January 31, 2016

इस मंत्र से मुर्दा भी हो जाता है जिंदा, लेकिन पढ़ने में गलती हुई तो…

इस मंत्र से मुर्दा भी हो जाता है जिंदा, लेकिन पढ़ने में गलती हुई तो…

 

shiva krishna-इस मंत्र से मुर्दा भी हो जाता है जिंदा, लेकिन पढ़ने में गलती हुई तो… 

हिंदू धर्म में दो मंत्रों महामृत्युंजय तथा गायत्री मंत्र की बड़ी भारी महिमा बताई गई हैं। कहा जाता है कि इन दोनों मंत्रों में किसी भी एक मंत्र का सवा लाख जाप करके जीवन की बड़ी से बड़ी इच्छा को पूरा किया जा सकता है चाहे वो दुनिया का सबसे अमीर आदमी बनने की इच्छा हो या अपना पूरा भाग्य ही बदलना हो।
लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि भारतीय ऋषि-मुनियों ने इन दोनों मंत्रों को मिलाकर एक अन्य मंत्र महामृत्युंजय गायत्री मंत्र अथवा मृत संजीवनी मंत्र का निर्माण किया था। इस मंत्र को संजीवनी विद्या के नाम से जाना जाता है। इस मंत्र के जाप से मुर्दा को भी जिंदा करना संभव है बशर्ते गुरू से इसका सही प्रयोग सीख लिया जाए। हालांकि भारतीय ऋषि-मुनि इस मंत्र के जाप के लिए स्पष्ट रूप से मना भी करते हैं।
क्या है महामृत्युंजय गायत्री (संजीवनी) मंत्र
ऊँ हौं जूं स: ऊँ भूर्भुव: स्व: ऊँ त्रयंबकंयजामहे
ऊँ तत्सर्वितुर्वरेण्यं ऊँ सुगन्धिंपुष्टिवर्धनम
ऊँ भर्गोदेवस्य धीमहि ऊँ उर्वारूकमिव बंधनान
ऊँ धियो योन: प्रचोदयात ऊँ मृत्योर्मुक्षीय मामृतात
ऊँ स्व: ऊँ भुव: ऊँ भू: ऊँ स: ऊँ जूं ऊँ हौं ऊँ
ऋषि शुक्राचार्य ने इस मंत्र की आराधना निम्न रूप में की थी जिसके प्रभाव से वह देव-दानव युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए दानवों को सहज ही जीवित कर सकें।
महामृत्युंजय मंत्र में जहां हिंदू धर्म के सभी 33 देवताओं (8 वसु, 11 रूद्र, 12 आदित्य, 1 प्रजापति तथा 1 वषट तथा ऊँ) की शक्तियां शामिल हैं वहीं गायत्री मंत्र प्राण ऊर्जा तथा आत्मशक्ति को चमत्कारिक रूप से बढ़ाने वाला मंत्र है। विधिवत रूप से संजीवनी मंत्र की साधना करने से इन दोनों मंत्रों के संयुक्त प्रभाव से व्यक्ति में कुछ ही समय में विलक्षण शक्तियां उत्पन्न हो जाती है। यदि वह नियमित रूप से इस मंत्र का जाप करता रहे तो उसे अष्ट सिदि्धयां, नव निधियां मिलती हैं तथा मृत्यु के बाद उसका मोक्ष हो जाता है।
संजीवनी मंत्र के जाप में निम्न बातों का ध्यान रखें
(1) जपकाल के दौरान पूर्ण रूप से सात्विक जीवन जिएं।
(2) मंत्र के दौरान साधक का मुंह पूर्व दिशा की ओर होना चाहिए।
(3) इस मंत्र का जाप शिवमंदिर में या किसी शांत एकांत जगह पर रूद्राक्ष की माला से ही करना चाहिए।
(4) मंत्र का उच्चारण बिल्कुल शुद्ध और सही होना चाहिए साथ ही मंत्र की आवाज होठों से बाहर नहीं आनी चाहिए।
(5) जपकाल के दौरान व्यक्ति को मांस, शराब, सेक्स तथा अन्य सभी तामसिक चीजों से दूर रहना चाहिए। उसे पूर्ण ब्रहमचर्य के साथ रहते हुए अपनी पूजा करनी चाहिए।

क्यों नहीं करना चाहिए महामृत्युंजय गायत्री (संजीवनी) मंत्र का जाप
आध्यात्म विज्ञान के अनुसार संजीवनी मंत्र के जाप से व्यक्ति में बहुत अधिक मात्रा में ऊर्जा पैदा होती है जिसे हर व्यक्ति सहन नहीं कर सकता। नतीजतन आदमी या तो कुछ सौ जाप करने में ही पागल हो जाता है तो उसकी मृत्यु हो जाती है। इसे गुरू के सान्निध्य में सीखा जाता है और धीरे-धीरे अभ्यास के साथ बढ़ाया जाता है। इसके साथ कुछ विशेष प्राणायाम और अन्य यौगिक क्रियाएं भी सिखनी होती है ताकि मंत्र से पैदा हुई असीम ऊर्जा को संभाला जा सके। इसीलिए इन सभी चीजों से बचने के लिए इस मंत्र की साधना किसी अनुभवी गुरू के दिशा- निर्देश में ही करनी चाहिए।