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Sunday, May 3, 2015

आप का व्यवसाय - Your Profession

आप का व्यवसाय - Your Profession

ऐसा देखा गया है कि एक ही व्यवसाय करने वाला जातक उसमें अपार सफलता प्राप्त कर लेता है और दूसरा ना चाहते हुए भी पतन का अधिकारी बनता है। जिस तरह मौसम सदैव एक जैसा नहीं रहता उसी तरह से मनुष्य का भाग्य भी एक जैसा नहीं रहता जरूरत रहती है तो मनुष्य के भाग्य को अनुकूल स्थिति में ले जाने की। ज्योतिष का कार्य मार्गदर्शन ही तो है - सुयोग के समय अत्यधिक लाभ और दुर्योग के समय न्यूनतम हानि। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार किसी को भी उसके व्यवसाय के बारें में शत-प्रतिशत सत्य बताया जा सकता है। इस सम्बन्ध में ज्योतिष के सारांश-सूत्र प्रस्तुत हैं - 
लग्न का अध्ययन -
लग्न से किसी जातक के व्यक्तित्व व चारित्रिक विशेष का अध्ययन किया जाता है। विभिन्न लग्न के जातकों का मानसिक विकास तथा मानसिक रूझान भिन्न होता है। उसके अनुसार ही उनका व्यवसाय होता है। विभिन्न लग्नों के व्यवसाय नीचे दिए गए हैं। जिन व्यक्तियों के पास अपनी जन्मकुंडली नहीं है और जिन्हें अपने लग्न का ज्ञान नहीं है वह अपनी राशि के अनुसार अपनी जीविका का चयन कर सकते हैं। 
मेष - पुलिस,  सेना अधिकारी, रक्षा मंत्रालय, लोहे इत्यादि का व्यवसाय, सर्जन, नेता, खिलाड़ी आदि। 

वृष - कलाकार, संगीतकार, लेखक, सुगन्धित वस्तुओं का व्यवसायी, कर-अधिकारी, दुग्ध व्यवसाय, वाहनों का व्यवसाय, विलासिता से संबंधित वस्तुएँ, आभूषण इत्यादि। 

मिथुन - वैज्ञानिक, पत्रकार, योजनाधिकारी, प्रकाशक, संपादक, इंजीनियर, सचिव, ठेकेदार, गणितज्ञ, अकाउंटेंट, चालक, दलाल आदि। 

कर्क - योजना विभाग, कवि, चित्रकार, नर्स, समाजसेवी, इतिहासकार, नौ सेना अधिकारी, जलपोत, वक्ता, मंत्री, सलाहकार आदि। 

सिंह - सरकारी सेवा, शेयर बाज़ार, संगीत, अधिकारी, नेता, मैनेजिंग डायरेक्टर, उच्च सेवा इत्यादि। यदि सूर्य की स्थिति शुभ हो तो अधिकारी बनना निश्चित है। 

कन्या - आर्किटेक्ट, इंजीनियर, ऑडिटर, कंप्यूटर और वैज्ञानिक उपकरणों से संबंधित, डॉक्टर, सर्जन, प्रकाशक, बीमा एजेंट, ज्योतिष, खगोलशास्त्री। 

तुला - न्यायविद, सलाहकार, आलोचक, सचिव, रसायनशास्त्री, चित्रकार, यातायात विभाग, द्रव्य का व्यवसाय, नर्तक, संगीतकार, कवि, गायक आदि। 

वृश्चिक -  सेना, चिकित्सक, रसायन विभाग में प्राध्यापक, पराविद्या, भूगोलशास्त्री, भूगर्भ वैज्ञानिक, संत-महात्मा, ज्योतिष, जासूस, पुलिस इत्यादि। 

धनु - अधिकारी, प्रोफेसर, बैंक कर्मचारी, धार्मिकवक्ता, राजनीति, कानून, आलोचक, कंपनी सेक्रेटरी, ऑडिटर, ठेकेदार इत्यादि। 

मकर - अर्थशास्त्री, आर्थिक सलाहकार, चार्टर्ड अकाउंटेंट, ब्रोकर, जमीन से निकली वस्तुओं का व्यापारी, दार्शनिक, कानूनी सलाहकार, संत, धर्मशास्त्री, ज्योतिष आदि। 

कुम्भ - खोजी, एडमिनिस्ट्रेटर, मनोवैज्ञानिक, ज्योतिष, भूगर्भशास्त्री, नौसेना, सीबीआई, चित्रकार, बिजली विभाग इत्यादि। 

मीन - समुद्र में व्यापर, जहाज, सलाहकार, मंत्री, ज्योतिष, संगीतज्ञ, कलाकार, धर्मशास्त्री, शिक्षा विभाग, व्यापारी, तेल एवं गैस विभाग आदि। 
द्वितीय भाव के उपस्वामी का अध्ययन -
कुंडली में द्वितीय भाव बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि जातक की धन-स्थिति का अध्ययन इस भाव से किया जाता है तथा यह भी पता लगाया जा सकता है कि धन प्राप्ति किस स्रोत से होगी। द्वितीय भाव के उपस्वामी का विभिन्न भावों से संबंध निम्न रूप से दिखाया गया है :-
यदि उपस्वामी संबंध द्वितीय भाव से हो - कारखाने, उद्योग, व्यापार, शेयर बाज़ार। 

यदि उपस्वामी का सम्बन्ध तृतीय भाव से हो - प्रकाशन, प्रेस, ट्रांसपोर्ट, दूर-संचार, लेखन, जर्नलिज्म, लाइब्रेरी। 

यदि उपस्वामी का संबंध चतुर्थ भाव से हो - शिक्षा संस्थान, जमीन इत्यादि से संबंधित कार्य, खान, संस्थान, वाहनों का व्यापर, कृषि। 

यदि उपस्वामी का संबंध पंचम भाव से हो - फिल्म, संगीत, थिएटर, राजनीति, खेल-कूद, पब्लिक रिलेशन, शेयर बाज़ार, पुजारी, मंत्र-विज्ञान। 

यदि उपस्वामी का संबंध षष्ठं भाव से हो - अस्पताल, सेनिटोरियम, सफाई विभाग, ब्रोकर, धन उधार देने वाली संस्था, बैंक। 

यदि उपस्वामी का संबंध सप्तम भाव से हो - सहयोग से व्यापार, महिलाओं संबंधी कार्य, कपड़ों का व्यापार, सुगंध का व्यापार, विदेश विभाग, अंतर्राष्ट्रीय संस्था। 

यदि उपस्वामी का संबंध अष्टम भाव से हो - बीमा विभाग, प्रोविडेंट फण्ड, कार्यालय, रजिस्ट्रार, पराविद्या, खोज, सर्जन, स्वास्थ्य विभाग,  संबंधी कार्य, ध्यान-विद्या, योग-विद्या। 

यदि उपस्वामी का संबंध नवम भाव से हो - धार्मिक संस्थान, कानून संबंधी कार्य, दर्शन, विदेशों में यात्रा, कानूनविद, धार्मिक पुस्तकों का प्रकाशन, उच्च शिक्षा संस्थान। 

यदि उपस्वामी का संबंध दशम भाव से हो - सरकारी सेवा, उच्च सेवाएं, राजदूत, मंत्री, डॉक्टर, नेता, सलाहकार, इंजीनियर। 

यदि उपस्वामी का संबंध एकादश भाव से हो -  सरकारी सेवा,  लाभ का पद, ,राष्ट्रीय नेता, आर्किटेक्ट, योजना विभाग, बिजली विभाग, संग्राहलय, कृषि व जल विभाग, विदेश सहायता प्राप्त संस्थान। 

यदि उपस्वामी का संबंध द्वादश भाव से हो -  जेल विभाग, संत, दर्शन, मनोचिकित्सा, पराविद्या, खोज, रसायन विज्ञान, पागलखाना, अस्पताल, ग़ैर-कानूनी धंधा।

द्वितीय भाव का उपस्वामी यदि चर राशि यानि मेष, कर्क, तुला व मकर में हो तो धन अवस्था अस्थिर होती है तथा जातक किसी अन्य स्रोत से भी धन प्राप्त कर सकता है। यदि उपस्वामी स्थिर राशि वृष, सिंह, व्रुश्चिक या कुम्भ राशि में हो तो धन की प्राप्ति एक ही स्रोत से होती है। यदि उपस्वामी द्विस्वभाव राशि में हो तो निश्चय ही एक से अधिक स्रोतों से धन-लाभ होगा।

दशम भाव का अध्ययन -

कुंडली में दशम भाव जातक के व्यवसाय को प्रदर्शित करता है। दशम भाव के सार्थक ग्रहों से यह पता लगाया जा सकता है कि जातक को किन व्यवसायों से लाभ होगा। प्रत्येक ग्रह किसी व्यवसाय से संबंध रखता है। दशम भाव के सार्थक ग्रहों का फल निम्न है :-

सूर्य - सरकारी सेवा, राजनीति, पिता के धन से व्यापर, विभागाध्यक्ष, मंत्री, प्रभावशाली व्यक्ति, सोने का कार्य।

चन्द्रमा - पानी के जहाज़ संबंधी कार्य, द्रव्य का व्यापर, योजना विभाग, कवि-कल्पनशीलक, सलाहकार, शराब का कार्य।

मंगल - सैन्य विभाग, बंदूकों का व्यापार, रसायन, सर्जन, नाई, लोहे का कार्य, मांस का व्यापर, पुलिस, नेता, कारपेंटर।

बुध - वैज्ञानिक, इंजीनियर, अकाउंटेंट, ज्योतिष, सूचना एवं प्रसार अधिकारी, वक्ता, कानूनविद, सिनेमा।

बृहस्पति - कानूनविद, धर्म-संस्थान, प्रोफेसर, दार्शनिक, बैंक, पुजारी, जर्नलिस्ट, राजनीतिज्ञ, संपादक, ज्योतिष।

शुक्र - कलाकार, संगीतकार, चित्रकार, वाद्य-यन्त्र संबंधी कार्य, खिलाड़ी व रत्नों का व्यापार, कपडा संबंधी कार्य, ट्रांसपोर्टर, नर्तक।

शनि - ज़मीन से निकलने वाली वस्तुओं संबंधी कार्य, लोहा व पीतल का कार्य, अर्धसरकारी संस्थान, पब्लिक सेक्टर, कृषि, लेबर, अफसर, भूगर्भशास्त्री, ब्रोकर, इंजीनियर, क्लर्क, मज़दूर।

राहू व केतू के फल उनके साथ स्थित ग्रहों के आधार पर हैं,  यदि कोई भी ग्रह साथ में न हो तो जिस राशि में राहू व केतू  हैं, उस राशि के स्वामी के फल होते हैं।

पुरुषों के स्वभाव को प्रभावित करते ग्रह (वृहस्पति , शुक्र ,शनि)

पुरुषों के स्वभाव को प्रभावित करते ग्रह (वृहस्पति , शुक्र ,शनि)

वृहस्पति :-- वृहस्पति बुद्धि ,ज्ञान , सम्मान , दया और न्याय का करक ग्रह है। जिस व्यक्ति का जन्म कुंडली में वृहस्पति ग्रह उत्तम स्थिति में होता है वह व्यक्ति विद्वान और धर्माधिकारी होता है। वह किसी के प्रति अन्याय नहीं करता और ना ही होने देता है। पूजा -पाठ मे अधिक ध्यान देता है।

   लेकिन ज्ञान की अधिकता होने से कभी -कभी व्यक्ति में अहंकार भी आने लगता है। बिन मांगे राय या कहिये कि अपनी  बात ही सर्वोपरि रख कर थोप देना भी स्वभाव बना लेता है।  और यह अहंकार व्यक्ति में अकेलापन और  शरीर में मेद की अधिकता करता है। जिस कारण मोटापे में वृद्धि होकर शरीर थुलथुला हो जाता है।
  वृहस्पति को सुधारने के लिये व्यक्ति को पूजा -पाठ की  अधिकता से बचना चाहिए। सुबह या शाम को मंदिर जाना चाहिए। लेकिन आरती के समय नहीं बल्कि पहले या बाद में। ऐसा करने से अपने ईष्ट से अधिक नज़दीकी महसूस कर सकता है और मन शांत रहेगा।

   लोगों से मेल -जोल अधिक बढ़ाये और उनका दुःख -दर्द सुने , समस्याओं का समाधान करें। अगर किसी वृद्धाश्रम मे जा कर उनका दर्द बाँट सके तो वृहस्पति अच्छे फ़ल देने लगता है। यहाँ पर मेरे कहने का अभिप्राय यह नही है कि वृद्धाश्रम मे जाकर फल -मिठाइयां बाँट कर आये। वह जाकर उनके चेहरे पर मुस्कान और दिल मे ख़ुशी बाँट कर आयें तो ज्यादा अच्छा रहेगा।

   पीले रंग से परहेज़ करें। वीरवार को पीली  भोज्य वस्तु या वस्त्र दान दी जा सकती है। वीरवार का व्रत भी लाभक़ारी रहेगा। विष्णु भगवान की पूजा और मन्त्र भी लाभकारी हैं।

 कमज़ोर वृहस्पति व्यक्ति को निस्तेज , नास्तिक ,निराशावादी , पेट संबन्धित बीमारी और विवाह और संतान मे विलम्ब देता है। अगर ऐसा है तो वृहस्पति को मज़बूत करने के उपाय करने चाहिए। पीला भोजन ,वस्त्र का प्रयोग अधिक किया जाना चाहिए। व्रत करना भी लाभकारी रहेगा। वृद्ध ब्राह्मण की सेवा , मज़बूरों की  शिक्षा में सहयोग भी वृहस्पति को मज़बूत बनाता है।

शुक्र :-- शुक्र ग्रह पुरुषों में विवाह , संतान , मनोरंजन , शयनसुख और ऐश्वर्य  का कारक  है। शुक्र से प्रभावित व्यक्ति ( अगर लग्न में शुक्र हो ) सांवले रंग का होता है। शुक्र गोरे रंग का नहीं बल्कि सौंदर्य का प्रतीक होता है। चेहरे से ही झलकता है अच्छा शुक्र। अच्छा शुक्र व्यक्ति को आकर्षक व्यक्तित्व के साथ -साथ उत्तम भवन ,वाहन , वस्त्राभूषण और सुखसुविधा प्रदान करता है। संगीत , कला और काव्य में पारंगत होता है। जन्म कुंडली का अच्छा शुक्र व्यक्ति को उत्तम चिकित्स्क और ज्योतिषी भी बना सकता है।

      कमज़ोर शुक्र  सौंदर्य में कमी सुख सुविधा में कमी , जीवन साथी से दूरी , नेत्र रोग,  गुप्तेन्द्रीय रोग,वीर्य दोष से होने वाले रोग , प्रोस्ट्रेट ग्लैंड्स, प्रमेह,मूत्र विकार ,सुजाक , कामान्धता,श्वेत या रक्त प्रदर ,पांडु इत्यादि रोग  उत्पन्न करता है।  

     कमज़ोर शुक्र को बलवान करने के लिए क्रीम रंग के कपड़ों का प्रयोग करना चाहिए। शुक्रवार का व्रत , देवी उपासना ( लक्ष्मी और दुर्गा ) करनी चाहिए। शुक्रवार को कन्याओं को खीर खिलाना , गाय को चारा डालना भी उचित रहेगा।  आलू का दान भी शुक्र मज़बूत करता है। 

   दूषित शुक्र से प्रभावित व्यक्ति समाज विरोधी गतिविधियों में संलग्न रहता है। मित्रों से नहीं बनती ,स्त्रियों में अधिक रूचि लेता है। सिनेमा , अश्लील-साहित्य और काम-वासना की ओर अधिक ध्यान रहता है। ऐसे में व्यक्ति को दुर्गा माँ की आराधना , नारी जाति  के प्रति सम्मान की भावना और सफ़ेद दूधिया रंग के वस्त्रों का दान करना चाहिए। खुशबुओं का प्रयोग अधिक मात्रा में ना करे। 

शनि :--  शनिग्रह के कुंडली में ग्रहों के साथ और किस भाव में स्थित है यह महत्वपूर्ण होता है क्यूंकि शनि जिस किसी भी भाव में स्थित होता है उस भाव की वृद्धि करता है लेकिन जिस भाव पर दृष्टि पड़ती है उस भाव के सुखों में कमी लाता है।

  अच्छा शनि व्यक्ति को न्याय प्रिय , विदेशी भाषा में पारंगत , उच्चाधिकारी , लोहे सम्बन्धी व्यापार का कारक बनता है। शनि ग्रह से प्रभावित व्यक्ति अपनी अलग विचारधारा बना कर रखता है। समाज से हट कर सोच रखता है। 

     कमज़ोर शनि से व्यक्ति आलसी , कामचोर और निर्धन बनता है। झगड़ालू भी बनाता है शनि । 
   शनि अँधेरे का कारक है जिस कारण से व्यक्ति निशाचर बना रहता है मतलब यह है कि अपराधी प्रवृत्ति अपना लेता है। वात रोग , अस्थि रोग , मनोन्माद भी यही देता है। पेट के रोग,जंघाओं के रोग,टीबी,कैंसर आदि रोग भी शनि की देन है। 

      शनि  को मज़बूत के लिए व्यक्ति को आचरण में सुधार लाना होगा। देश के प्रति प्रेम ,सेवा और सद्भावना रखनी होगी। हर कोई तो सीमा पर जा कर प्रहरी नहीं बन सकता तो देश सेवा के और भी मायने है जैसे राष्ट्रिय संपत्ति की सुरक्षा , पानी -बिजली की फिजूल खर्ची ना करना और अपने देश के प्रति कर्तव्यों का भली  भांति पालन करना भी शनि ग्रह अच्छा फल देने लग जाता है। 

    अपने नौकरों  दया भाव रखना भी शनि को अनुकूल बनाता है। काली माता , हनुमान जी और शिव जी की आराधना , शनि स्त्रोत ,हनुमान चालीसा , सुन्दरकाण्ड का पाठ तथा दुर्गा शप्तशती का पाठ शनि को शांत करने में सहायक है। काले , गहरे नीले रंगों का इस्तेमाल ना करें बल्कि शनिवार को दान दें। शनिवार को राज़मा , काले उड़द और तेल का दान भी उपयुक्त रहेगा। शनिवार को चमेली के तेल का दीपक हनुमान जी के आगे करना शनि को शांत करेगा। 

( ॐ शांति )जारी....! 
    

Friday, March 13, 2015

अपने आराध्य देवता कुल देवता तथा इष्ट देवता को हम कैसे जान सकते है

 आराध्य देवता कुल देवता तथा इष्ट देवता को हम कैसे जान सकते है



  आराध्य देवता कुल देवता तथा इष्ट देवता को हम कैसे जान सकते है

 

अपने आराध्य देवता कुल देवता तथा इष्ट देवता को हम कैसे जान सकते है ? कैसे करे हम अपने आराध्य की उपासना ? तथा जानिये किस आराध्य देवता की पूजा कर के हम अपने जीवन को खुशहाल एवं प्रगति के पथ पर ले जा सकते है?...

“आप को अपने भीतर से ही खुद का एवं अपने आराध्य का विकास करना होता है। कोई भी ज्ञान आप को बिना आराध्यदेव की कृपा से आपको कुछ सीखा नहीं सकता, कोई भी शक्ति आपको बिना अपने आराध्य देव के कृपा बिना आध्यात्मिक एवं धनवान नहीं बना सकती। आपको सिखाने वाली और प्रगति की राह पर ले जाने वाली शक्ति और कोई नहीं, सिर्फ आपकी आत्मा एवं उस आत्मा मे बसने वाले हमारे आराध्य(इश्ट) देव ही है।"

नीचे सभी राशियों के आराध्य देवता दिए जा रहे हैं।
अपनी राशि के अनुसार अपने देवता की आराधना कर अपने जीवन को सुखी बनायेl

मेष : हनुमान जी
वृषभ : दुर्गा माँ
मिथुन : गणपति जी
कर्क: शिव जी
सिंह : विष्णु जी (श्रीराम )
कन्या : गणेश जी
तुला : देवी माँ
वृश्चिक : हनुमान जी
धनु : विष्णु जी
मकर : शिव जी
कुम्भ : शिव का रूद्र रूप
मीन : विष्णु जी (सत्यनारायण भगवान)

शास्त्रों की मान्यतानुसार अपने इष्ट देव की आराधना करने से मनोवांछित फल प्राप्त होते हैं। आपके आराघ्य इष्ट देव कौन से होंगे इसे आप अपनी जन्म तारीख, जन्मदिन, बोलते नाम
की राशि या अपनी जन्म कुंडली की लग्न राशि के अनुसार जान सकते हैं।

जन्म माह : जिन्हें केवल जन्म का माह ज्ञात है, उनके लिए इष्ट देव
इस प्रकार होंगे-

-जिनका जन्म जनवरी या नवंबर माह में हुआ हो वे शिव या गणेश की पूजा करें।

-फरवरी में जन्मे शिव की उपासना करें।

-मार्च , अगस्त व दिसंबर में जन्मे व्यक्ति विष्णु की साधना करें।

-अप्रेल, सितंबर, अक्टूबर में जन्मे व्यक्ति गणेशजी की पूजा करें।

-मई व जून माह में जन्मे व्यक्ति मां भगवती की पूजा करें।

-जुलाई माह में जन्मे व्यक्ति विष्णु व गणेश का घ्यान करें।

जन्म वार से : जिनको वार का पता हो, परंतु समय का पता न हो, तो वार के
अनुसार इष्ट देव इस प्रकार होंगे-

रविवार- विष्णु।
सोमवार- शिवजी।
मंगलवार- हनुमानजी
बुधवार- गणेशजी।
गुरूवार- शिवजी
शुक्रवार- देवी।
शनिवार- भैरवजी।

जन्म कुंडली से : जिनको जन्म समय ज्ञात हो उनके लिए जन्म
कुंडली के पंचम स्थान से पूर्व जन्म के संचित कर्म, ज्ञान,
बुद्धि, शिक्षा, धर्म व इष्ट का बोध होता है। अरूण संहिता के अनुसार
व्यक्ति के पूर्व जन्म में किए गए कर्म के आधार पर ग्रह या देवता भाव
विशेष में स्थित होकर अपना शुभाशुभ फल देते हैं।

राशि के आधार पर : पंचम स्थान में स्थित राशि के आधार पर आपके इष्ट देव
इस प्रकार होंगे-

मेष: सूर्य या विष्णुजी की आराधना करें।
वृष: गणेशजी।.
मिथुन: सरस्वती, तारा, लक्ष्मी।
कर्क: हनुमानजी।
सिंह: शिवजी।
कन्या: भैरव, हनुमानजी, काली।
तुला: भैरव, हनुमानजी, काली।
वृश्चिक: शिवजी।
धनु: हनुमानजी।
मकर: सरस्वती, तारा, लक्ष्मी।
कुंभ: गणेशजी।
मीन: दुर्गा, राधा, सीता या कोई देवी।

ग्रह के आधार पर इष्ट: पंचम स्थान में स्थित ग्रहों या ग्रह
की दृष्टि के आधार पर आपके इष्ट देव।

सूर्य: विष्णु।
चंद्रमा- राधा, पार्वती, शिव, दुर्गा।
मंगल- हनुमानजी, कार्तिकेय।
बुध- गणेश, विष्णु।
गुरू- शिव।
शुक्र- लक्ष्मी, तारा, सरस्वती।
शनि- भैरव, काली।

llजय श्री राम ll

Thursday, March 12, 2015

वनस्पति और जड़ों द्वारा उपाय

 वनस्पति और जड़ों द्वारा उपाय

ज्योतिष का एक क्षेत्र एेसा भी है जहाँ प्रत्येक वर्ग व्यक्ति के लिये समाधान है,वह है वनस्पति और जड़ों को धारण कर के अपने ग्रहयोगों को सुधारना. यह बहुत सस्ता,प्रभावशाली और सहज उपाय है जिसमें ग्रहों के अनुसार जड़ों और वनस्पतियों को विभक्त किया गया है. Þशारदा तिलकÞ और अन्य कई मध्य युगीन ग्रंथों में इस उपाय का उल्लेख मिलता है. एक निश्चित प्रक्रिया के अनुसार यदि अपनी राशि,नक्षत्र और कुंडली में ग्रहों की स्थिति के अनुरूप जड़ों को धारण किया जाये तो विस्मयकारी तरीके से लाभ होता है आपकी कुंडली में जो ग्रह आपके लिये हितकारी और प्रगतिकारक हैं उनका किसी अच्छे ज्योतिष से निर्धारण करा कर उस के अनुरूप जड़ को शुद्ध कर के,उस ग्रह से सम्बंधित दिन मंत्रों का जाप कर के धारण करें और प्रतिदिन जाप करते रहें तो निश्चित लाभ होता है.

सूर्य

यदि आपकी कुंडली में सूर्य नीच का होकर तुला राशि में है और केंद्र में या लग्नस्थ है तो कृत्तिका नक्षत्र वाले दिन बेल का एक जड़ प्रात:काल तोडक़र,शिवालय में शिवजी को समर्पित करें और ऊँ भास्कराय ह्रीं मंत्र का जाप करने के पश्चात गुलाबी धागे से धारण करें. प्रतिदिन इस मंत्र का जाप करते रहें. रोग,संतानहीनता जैसी अन्य कई समस्याओं का समाधान होगा.

चंद्र

यदि आप की कुंडली में चंद्र नीच का होकर वृश्चिक राशि में है,या राहु,केतु और शनि द्वारा प्रभावित है तो, रोहिणी नक्षत्र वाले दिन खिरनी की जड़, शुद्ध करके शिवजी को समर्पित करें और ऊँ श्रां श्रीं श्रौं स:चंद्रमसे नम: मंत्र का जाप कर के सफेद धागे में धारण करें. फेफड़े सम्बंधित रोग,एकाकीपन और भावनात्मक समस्याओं का समाधान होगा.

मंगल

आपकी कुंडली में मंगल नीच का होकर कर्क राशि में हो या आप मांगलिक हों तो मृगशिरा नक्षत्र वाले दिन अनंतमूल की जड़ शुद्धिकरण के पश्चात हनुमान जी की पूजा कर के ऊँ अं अंगारकाय नम: मंत्र का जाप कर के नारंगी धागे से धारण करें. क्रोध,अवसाद और वैवाहिक बाधा से मुक्ति मिलेगी

बुध

यदि आपकी कुंडली में बुध द्वादश,अष्टम भाव में या नीच का होकर मीन राशि में है, तो आप आश£ेषा नक्षत्र वाले दिन विधारा की जड़ गणेश भगवान को को समर्पित करने के पश्चात ऊँ बुं बुधाय नम: मंत्र का जाप कर के हरे रंग के धागे में धारण करें. इस से बुद्धि विकसित होगी तथ निर्णय लेने में हो रही त्रुटि का भी समाधान होगा.

गुरु

आपकी कुंडली में यदि गुरु रहु द्वरा युक्त है,राहु द्वारा ²ष्ट है या नीच का होकर मकर राशि में है,तो शुद्ध और ताजी हल्दी की गाँठ पीले धागे में, पुनवर्सु नक्षत्र वाले दिन कृष्ण भगवान या बृहस्पति देव जी की पूजा कर के ऊँ बृं बृहस्पतये नम: मंत्र का जप करके धारण करें. व्यवसाय,नौकरी,विवाह सम्बन्धी समस्या और लीवर सम्बन्धी रोगों में लाभ होगा.

शुक्र

यदि आपकी कुंडली में शुक्र अष्टम भाव में है या नीच का होकर कन्या राशि में है, तो आप सरपोंखा की जड़, भरणी नक्षत्र वाले दिन सफेद धागे से सायंकाल के समय लक्ष्मी जी का पूजन कर ऊँ शुं शुक्राय नम: मंत्र का जाप कर के धारण करें. संतानहीनता,कर्ज की अधिकता और धन के अभाव जैसी समस्या से मुक्ति मिलेगी.

शनि

आपकी कुंडली में यदि शनि सूर्य युक्त है,सप्तम भाव में है या नीच का होकर मेष राशि में है तो आप अनुराधा नक्षत्र वाले दिन बिच्छू या बिच्छौल की घांस को नीले धागे से काली जी की पूजा के पश्चात ऊँ शं शनैश्चराय नम: मंत्र का जाप कर के धारण करें. कार्यों में हो रहे विलम्ब,कानूनी अड़चन और रोगों से मुक्ति मिलेगी.

राहु

आपकी कुंडली में राहु लग्न,सप्तम या भाग्य स्थान मे है, तथा शुभ ग्रहों से युक्त है तो आप आद्र्रा नक्षत्र वाले दिन चन्दन की लकड़ी का टुकड़ा शिव जी का अभिषेक कर के भूरे धागे में ऊँ रां राहुए नम: मंत्र का जाप कर के धारण करें. रोग,चिड़चिड़ापन,क्रोध,बुरी आदतों तथा अस्थिरता से मुक्ति मिलेगी.

केतु

यदि आपकी कुंडली में केतु,चन्द्र या मंगल युक्त होकर लग्नस्थ है, तो आप अश्विनी नक्षत्र वाले दिन गणेश जी का पूजन करने के पश्चात शुद्ध की हुई असगन्ध या अश्वगन्धा की जड़, ऊँ कें केतवे नम: मंत्र का जाप करने के पश्चात, नारंगी धागे से धारण करें. चर्म सम्बन्धी रोग,किडनी रोगों और वैवाहिक समस्याओं में लाभ होगा.
याद रखें कि समस्या की पूर्ण मुक्ति के लिये, आपको मंत्रों का जाप प्रतिदिन करना होगा.

ग्रह और उनसे सम्बन्धित दान समग्री

यदि आपको कोई ग्रह परेशान कर रहा है,तो सम्बन्धित जड़ को धारण करने के पश्चात उस से सम्बन्धित वस्तुओं का गरीब और असहाय लोगों को दान करने से भी लाभ होता है:

सूर्य : माणिक्य, लाल वस्त्र, लाल पुष्प, लाल चंदन, गुड़, केसर अथवा तांबा.

चंद्र : बांस की टोकरी, चावल, श्वेत वस्त्र, श्वेत पुष्प, घी से भरा पात्र, चांदी, मिश्री, दूध, दही.


मंगल : मूंगा, गेहूं, मसूर, लाल वस्त्र, कनेर पुष्प, गुड़, तांबा, लाल चंदन, केसर.


बुध : हरे मूंग, हरा वस्त्र, हरा फल, पन्ना, केसर, कस्तूरी, कपूर, घी, मिश्री, धार्मिक पुस्तकें.


गुरू : घी, शहद, हल्दी, पीत वस्त्र, शास्त्र पुस्तक, पुखराज, लवण, कन्याओं को भोजन.


शुक्र : सफेद वस्त्र, श्वेत स्फटिक, चावल, सुगंधित वस्तु, कपूर, अथवा पुष्प, घी- शक्कर- मिश्री-दही.


शनि : तिल, सभी तेल, लोहा धातु, छतरी, काली गाय, काला कपड़ा, नीलम, जूता,कंबल.


राहु : गेहूं, उड़द, काला घोड़ा, खडग़, कंबल, तिल, लौह, सप्त धान्य, अभ्रक.


केतु : तिल, कंबल, काला वस्त्र तथा पुष्प, सभी तेल, उड़द, काली मिर्च, सप्तधान्य.


प्राचीन आयुर्वेद सम्बंधी ग्रंथों में, रोगों के उपचार के लिये भी इन वनस्पतियों और जड़ों का बहुतायत में उपयोग मिलता है. ज्योतिष और आयुर्वेद का गहरा अंर्तसंबंध है और इसी के अनुरूप रोगों की चिकित्सा का भी प्रावधान राशि कालपुरुष बना कर किया गया है. !

Tuesday, January 27, 2015

ग्रहों को अपने अनुकूल बनाये

ग्रहों को अपने अनुकूल बनाये 

सूर्य

सूर्य : सूर्य ग्रह पिता का प्रतिनिधित्व करता है।
पिता की आज्ञाओं का पालन करें और उनमें
ईश्वरीय अंश के दर्शन करें आपके
सभी काम बनें...गे। पिता का पूजन करने से काम राम में
बदलेगा, अहंकार प्रेम में बदलेगा एवं पिता के
आशीर्वाद से मंगल होगा।

चंद्रमा


 चंद्रमा : चंद्रमा माता का प्रतिनिधित्व करता है। इस ग्रह
की सौम्यता के कारण इसे माता कहा जाता है
तो प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर सबसे पहले
मां का आशीर्वाद लें। ईश्वर का आशीर्वाद
फलित होने में वक्त लग सकता है लेकिन
माता का आशीर्वाद तुरंत असर दिखाता है।

 मंगल


मंगल : मंगल ग्रह भाइयों का प्रतिनिधित्व करता है। बड़े भाई से
आशीर्वाद ग्रहण करें और छोटे को लाड प्यार करें।
अगर आपके भाई खुश रहेंगे तो जीवन में
आपको लगातार सफलता मिलती रहेगी।
सामाजिक और राजनितिक मंच पर भी आपका नाम
सम्मान और आदर से लिया जाएगा।

 बुध


बुध : बुध ग्रह कन्या, मौसी, बहन, बुआ
का प्रतिनिधित्व करता है। इन्हें नाराज न करें एवं इनसे अच्छे
संबंध स्थापित करें। माथे पर केसर का तिलक लगाएं और स्वर्ण
धारण करें।

 गुरु


गुरु : गुरु ग्रह ब्राह्मण अथवा बुजुर्गों का प्रतिनिधित्व
करता है। रोजाना ब्राह्मण
अथवा बुजुर्गों का आशीर्वाद लेने से हमें प्रगति के
पथ पर आगे बढ़ने में मदद तो करता ही है, हमारे
ऊपर आए संकट भी टाल देता है।

 शुक्र


शुक्र : शुक्र को स्त्री ग्रह माना जाता है।
पति अपने व्यवहार से
कितनी भी बुरी परिस्थियतियों में
हो समझदारी से काम लें।
पत्नी को हमेशा खुश रखें। पति अधूरा है
पत्नी के बिना, पत्नी और पति के
बीच स्थिर संबंध होने चाहिए।

 शनि


शनि : शनि देव गरिबों से अत्यधिक प्रेम करते हैं अत
उनकी कृपा प्राप्ति के लिए घर के नौकरों को खुश रखें।
शनिवार के दिन शनि संबंधित दान की वस्तुएं दान करते
रहें।
राहु / केतु

राहु / केतु : राहु या केतु की कृपा प्राप्त करने के
लिए रोजाना गरीब या अंगहीन
लोगों की सेवा करें।

Saturday, January 24, 2015

नवग्रह रत्न पुखराज और हीरा (Gemstone Yellow Sapphire and Diamond)


नवग्रह रत्न पुखराज और हीरा 

(Gemstone Yellow Sapphire and Diamond)


नवग्रहों में अद्भुत शक्तियां है जिसके कारण इसे देवताओं के समान आदर दिया गया है.यह दवा की भांति व्यक्तियों को पीड़ा से उबारने में सक्षम होता है.इनमें कमज़ोर ग्रहों को बलवान बनाने की क्षमता होती है जिससे असंभव को भी संभव करने में भी राशि रत्न कारगर होते हैं.

पुखराज की ज्योतिषीय विशेषता Astrological Characteristics of Yellow Sapphire
बृहस्पति ग्रह का रत्न पुखराज पीली आभा लिये होता है.यह गहरा पीला, हल्का पीला एवं सफेद भी होता है.छूने में ठोस, चिकना, चमकीला, दाग़ धब्बा रहित पुखराज उत्तम होता है.दूध में रात भर रखने से असली पुखराज क्षीण नहीं होता है और न ही इसका रंग फीका होता है.पुखराज धारण करने से पहले अच्छी तरह जांच परख लेना चाहिए कि रत्न दोष रहित हो.

पुखराज धारण करने से लाभ Astrological Benefits of wearing Yellow Sapphire
जिस व्यक्ति की कुण्डली में बृहस्पति नीच का होता है अथवा कमजोर होता है उनके लिए पुखराज धारण करना लाभप्रद होता है.पुखराज अध्यात्म, सत्यता, लनशीलता और सजगता का प्रतीक होता है.प्रेमियो के लिए यह भाग्यशाली रत्न माना जाता है.मानसिक शांति एवं आत्मिक शांति के लिए भी यह रत्न लाभकारी होता है.इस रत्न को धारण करने से वाणी सम्बन्धी दोष एवं गले की पीड़ा से राहत मिलती है.प्राचीन यूनान में इसे अपोलो देवता द्वारा प्रदान किया गया माना जाता था जिसका उपयोग कई प्रकार के रोगों के ईलाज के लिए किया जाता था.ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार जिस कन्या की शादी में बार बार बाधा आ रही हो वह अगर पुखराज धारण करती हैं तो विवाह में बाधक तत्व का अंत होता है और जल्दी शादी होती है.

हीरा की ज्योतिषीय विशेषता Astrological Characteristics of Diamond
हीरा संसार का सबसे कठोर रत्न है.इसे किसी भी अन्य रत्न से खरोंचा नहीं जा सकता.हीरा जितना कठोर व चमकीला होता है उतना ही अच्छा माना जाता है.यह मुख्यत: सफेद, पीला , लाल, गुलाबी और काला होता है.मान्यताओं के अनुसार संतान की इच्छा रखने वाली महिलाओं को हीरा धारण नहीं करना चाहिए.ज्योतिषशास्त्र इस मान्यता को नही स्वीकार करता है. ज्योतिषशास्त्र के नियमानुसार जो स्त्री त्रिकोण हीरा धारण करती हैं उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है.

हीरा धारण करने से लाभ Astrological Benefits of wearing Diamond
हीरा शुक्र का रत्न है.तुला और वृषभ राशि वाले अगर इस रत्न को धारण करते हैं तो उनका शुक्र मजबूत होता है फलत: शुक्र से सम्बन्धित सभी क्षेत्रो में उन्हें लाभ मिलता है.जिनकी कुण्डली में शुक्र कमज़ोर अथवा मंदा है उन्हें भी हीरा धारण करने से लाभ मिलता है.हीरा की विशेषता है कि इसे धारण करने वाला व्यक्ति साहसी, बुद्धिमान और उत्साही होता है.हीरा कई प्रकार के मानसिक रोगों में लाभकारी होता है.यह जहर काटने में भी सक्षम होता है.हीरा धारण करने वाले पर जादू टोने का प्रभाव नहीं होता है.रंग के अनुसार हीरा का अलग अलग प्रभाव होता है जैसे लाल और पीला हीरा राजनीति और प्रशासन से सम्बन्धित व्यक्तियो के लिए लाभप्रद होता है.सामाजिक, धार्मिक और आध्यात्मिक क्षेत्र से जुड़े हुए लोगों के लिए सफेद हीरा उत्तम होता है.